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Punjab 95 Movie Controversy: 48 घंटे में ZEE5 से हटी दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’; जानें ‘सुपरकॉप’ केपीएस गिल और 90s के पंजाब की असली कहानी

Entertainment & National News: कल्पना कीजिए 1980 और 90 के दशक का वो पंजाब, जहां सड़कों पर खून बह रहा था, स्कूल-कॉलेज बंद थे और खेत सूने पड़े थे। अखबारों के पन्ने हर दिन किसी पुलिस अधिकारी की हत्या, बम ब्लास्ट या युवाओं के ‘एंकाउंटर’ की खबरों से रंगे होते थे।

इसी खौफनाक दौर पर बनी दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ (पुराना नाम- Punjab 95) अचानक विवादों के केंद्र में आ गई है। 3 जुलाई 2026 को OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 पर रिलीज होने के महज 48 घंटे के भीतर ही इस फिल्म को कथित तौर पर भारत सरकार के निर्देशों के बाद हटा दिया गया है। आइए समझते हैं इस पूरे विवाद की जड़ क्या है।

खबर की मुख्य बातें (Highlights)

  • अचानक बैन: ZEE5 से 48 घंटे के भीतर बिना किसी सूचना के फिल्म हटाई गई।
  • खालड़ा की कहानी: फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की सच्ची कहानी पर आधारित है।
  • सेंसर बोर्ड का पेंच: CBFC ने फिल्म में 127 कट लगाने और नाम ‘पंजाब 95’ से ‘सतलुज’ करने की मांग की थी।
  • 90 का दशक: कहानी में पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) केपीएस गिल के सख्त और विवादित तौर-तरीकों को दिखाया गया है।

क्या है ‘Punjab 95’ (सतलुज) का असली विवाद?

हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक बैंक कर्मचारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की सच्ची कहानी है। फिल्म में खालड़ा का मुख्य किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है।

खालड़ा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब पुलिस द्वारा ‘लावारिस’ बताकर जला दिए गए हजारों अज्ञात शवों के सबूत जुटाए थे। उनका दावा था कि करीब 25,000 अनक्लेम्ड शवों का अंतिम संस्कार किया गया, जो असल में वे युवा थे जिन्हें पुलिस ने अवैध रूप से मार दिया था। खालड़ा ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर (कनाडियन हाउस ऑफ कॉमन्स) तक उठाया और सीधे तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल को चुनौती दी थी।

दिनदहाड़े खालड़ा का अपहरण और हत्या

इन खुलासों के बाद 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा को उनके घर के बाहर कार धोते वक्त दिनदहाड़े अगवा कर लिया गया।

बाद में सीबीआई (CBI) जांच में यह साबित हुआ कि पंजाब पुलिस के अधिकारियों ने ही उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी। इस मामले में 2005 में कई पुलिसकर्मियों को उम्रकैद की सजा हुई। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2011 में पंजाब पुलिस की कड़ी आलोचना की थी, लेकिन खालड़ा का शव कभी नहीं मिला।

विवाद और असल जिंदगी के किरदारों का कनेक्शन:

फिल्म/कहानी के मुख्य बिंदुअसल जिंदगी के तथ्य
फिल्म का असली नामपंजाब 95 (सेंसर बोर्ड ने नाम ‘सतलुज’ करवाया)
मुख्य किरदार (दिलजीत दोसांझ)जसवंत सिंह खालड़ा (मानवाधिकार कार्यकर्ता)
पंजाब पुलिस प्रमुखकेपीएस गिल (तत्कालीन DGP पंजाब)
सीएम की हत्या का दृश्य31 अगस्त 1995 को सीएम बेअंत सिंह की हत्या

केपीएस गिल: ‘सुपरकॉप’ या विवादित पुलिस अधिकारी?

इस पूरे विवाद (Punjab 95 Movie Controversy) में सबसे बड़ा नाम कंवर पाल सिंह गिल (KPS Gill) का है। 1958 बैच के आईपीएस अफसर गिल दो बार पंजाब के DGP रहे।

  • मिलिटेंसी का खात्मा: 1988 में ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ के जरिए उन्होंने बिना ज्यादा नुकसान के स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को सरेंडर करवाया।
  • गोली के बदले गोली: 1991 में जब वे दोबारा DGP बने, तब उन्होंने “बुलेट फॉर बुलेट” (गोली के बदले गोली) और मिलिटेंट मारने पर इनाम देने की सख्त नीति अपनाई। 1995 तक उन्होंने पंजाब से आतंकवाद का लगभग सफाया कर दिया।
  • विवादों का साया: एक तरफ उन्हें ‘सुपरकॉप’ और पंजाब का रक्षक कहा गया, तो दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उन पर फर्जी एनकाउंटर और अवैध हिरासत के गंभीर आरोप लगाए।

फिल्म पर आगे क्या होगा?

रिलीज के दो दिन बाद ही बैन होने से फिल्म के पायरेटेड वर्जन ऑनलाइन वायरल हो गए हैं। राम गोपाल वर्मा, अनुराग कश्यप और सांसद हरभजन सिंह जैसी हस्तियों ने फिल्म के समर्थन में आवाज उठाई है। मेकर्स अब इस अचानक हुए बैन के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं।

निष्कर्ष: 90 के दशक का पंजाब एक बेहद जटिल और खौफनाक दौर था। केपीएस गिल ने सख्ती से आतंकवाद को खत्म किया— यह एक फैक्ट है। लेकिन उनके तरीके बेहद विवादास्पद रहे और कई निर्दोषों की जान गई— यह भी एक कड़वी सच्चाई है, जिसे यह फिल्म पर्दे पर लाने की कोशिश कर रही है।

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