Bastar Tribal Culture: अबूझमाड़ के गांवों के अनोखे नियम; न भव्य मंदिर न मूर्तियां, प्रकृति के बीच ‘देवगुड़ी’ में बसती है आदिवासियों की आस्था

Bastar Tribal Culture: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) का बस्तर अंचल और खासकर उसका ‘अबूझमाड़’ (Abujhmad) इलाका अपनी घनी हरियाली, दुर्गम पहाड़ियों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां निवास करने वाली माड़िया (Madia) और मुड़िया (Mudia) जनजातियों की जीवनशैली आज भी प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है। प्रकृति के प्रति इनके प्रेम और आस्था का सबसे अनोखा और जीवंत उदाहरण गांवों और जंगलों के बीच मौजूद ‘देवगुड़ी’ (Devgudi) में देखने को मिलता है, जो आम मंदिरों की अवधारणा से बिल्कुल अलग है।
खबर की मुख्य बातें (Bastar Tribal Culture)
- अनोखा आस्था केंद्र: देवगुड़ी में कोई बड़े शिखर या सीमेंट की मूर्तियां नहीं होतीं, यहां लकड़ी और पत्थरों को देवता माना जाता है।
- पेड़ काटने पर रोक: ‘देवराही’ वाले इलाके में पेड़ों की कटाई और शिकार करने पर सख्त पाबंदी होती है।
- आंगा देव की मान्यता: बीजा या सरई की लकड़ियों से बनी पालकी को देवता मानकर पूजा जाता है।
- गायता और सिरहा की भूमिका: गांव के धार्मिक अनुष्ठान और संकट के समय मार्गदर्शन का काम ‘गायता’ और ‘सिरहा’ करते हैं।
भव्य मंदिर नहीं, प्रकृति ही है भगवान (What is Devgudi?)
बस्तर के आदिवासी समाज की ‘देवगुड़ी’ में न तो ऊंचे-ऊंचे शिखर होते हैं और न ही बड़ी-बड़ी पत्थर या सीमेंट की मूर्तियां स्थापित होती हैं। यह आमतौर पर गांव के बाहर या घने जंगल के बीच एक साधारण छप्पर के नीचे बना स्थान होता है, जिसके आसपास महुआ, सरई और सल्फी के पेड़ होते हैं। यहां देवी-देवताओं के प्रतीक के रूप में लकड़ी के खंभों, विशेष पत्थरों, त्रिशूल, लोहे की सांकल और मिट्टी से बने घोड़े या हाथी को रखा जाता है।
‘देवराही’ में पेड़ काटने और शिकार पर सख्त पाबंदी
देवगुड़ी के आसपास फैले जंगल को कई जगहों पर ‘देवराही’ (Devrahi) कहा जाता है। आदिवासी परंपरा के अनोखे नियमों के तहत इन क्षेत्रों में:
- किसी भी हरे पेड़ को काटने पर पूरी तरह रोक होती है।
- इस इलाके में वन्यजीवों का शिकार (Hunting) करना भी सख्त मना है।
इस प्रकार आदिवासियों की यह धार्मिक मान्यता सीधे तौर पर जंगल और वन्यजीवों के संरक्षण (Nature Conservation) से जुड़ जाती है। यहां मुख्य रूप से आंगा पेन, बूढ़ादेव और माटी देव की पूजा होती है।
आंगा देव की मान्यता और ‘पहली उपज’ का नियम
- आंगा देव (Aanga Dev): देवगुड़ी परंपरा में आंगा देव का विशेष महत्व है। गांव में कोई संकट आने या नए देवता की स्थापना के समय जंगल से पवित्र लकड़ी (बीजा या सरई) चुनी जाती है। इसकी तीन-चार लकड़ियों को जोड़कर पालकी जैसी आकृति बनाई जाती है, जिसे देवता का स्वरूप मानकर त्योहारों पर कंधे पर उठाया जाता है।
- पहली उपज का नियम: आदिवासी समाज में खेती और जंगल से मिलने वाली नई उपज (फसल, महुआ, आम आदि) का पहला हिस्सा सीधे तौर पर देवता (देवगुड़ी) को अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही गांव वाले उसका इस्तेमाल शुरू करते हैं।
गायता और सिरहा: गांव के धार्मिक और सामाजिक अगुवा
देवगुड़ी की परंपराओं का संचालन मुख्य रूप से गायता (Gayta) और सिरहा (Sirha) करते हैं।
- गायता: यह गांव का धार्मिक प्रमुख होता है, जो सभी पूजा-पाठ और अनुष्ठान संपन्न कराता है।
- सिरहा: मान्यता है कि विशेष अवस्था में सिरहा पर देवता का प्रभाव (आवेश) आता है। गांव में बीमारी, संकट या विवाद होने पर पारंपरिक रूप से सिरहा से ही मार्गदर्शन लिया जाता है।
सामाजिक फैसलों का केंद्र: देवगुड़ी केवल पूजा-पाठ की जगह नहीं है, बल्कि यह गांव की ‘संसद’ की तरह भी काम करती है। पारिवारिक या सामुदायिक विवादों पर चर्चा और फैसले यहीं बैठकर लिए जाते हैं। आज आधुनिकता के दौर में भी अबूझमाड़ की देवगुड़ी आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के गहरे रिश्ते की एक अनूठी मिसाल बनी हुई है।






