Tiger Tracking:बस्तर के जंगलों में अब ‘बाघ’ की सुरक्षा का चलेगा ऑपरेशन! पहली बार मैदानी अमले को मिल रही ‘टाइगर प्रोटेक्शन’ की हाई-टेक ट्रेनिंग

Tiger Tracking:छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बस्तर (Bastar) संभाग से एक बेहद सुखद और सकारात्मक खबर सामने आई है। कभी जिन घने जंगलों में सुरक्षा बलों की गश्त सिर्फ नक्सल विरोधी अभियानों और मुठभेड़ों तक सीमित हुआ करती थी, अब वहां देश के सबसे बड़े और शानदार शिकारी यानी ‘बाघ‘ (Tiger) की सुरक्षा के लिए बकायदा एक मजबूत रणनीति तैयार हो रही है।
बस्तर के इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जब वन विभाग के मैदानी अमले को बाघों की सुरक्षा के लिए ट्रेंड करने हेतु संभाग स्तरीय ‘टाइगर प्रोटेक्शन वर्कशॉप’ (Tiger Protection Workshop) का शंखनाद किया गया है। वन मंत्री केदार कश्यप (Kedar Kashyap) के विशेष मार्गदर्शन में जगदलपुर (Jagdalpur) के वन विद्यालय में चल रहा यह दो दिवसीय आयोजन सिर्फ एक रूटीन ट्रेनिंग नहीं है, बल्कि यह बस्तर के जंगलों में ‘टाइगर कॉरिडोर’ को पुख्ता करने का एक विजनरी मास्टरप्लान है।
गोलियों की गूंज से ‘पगमार्क’ (Pugmark) ट्रैकिंग तक का सफर(Tiger Tracking)
दरअसल, पिछले कुछ सालों में बस्तर के घने जंगलों में बाघों की मूवमेंट (Tiger Movement) और उनकी वापसी के बेहद उत्साहजनक संकेत मिले हैं। ऐसे में वन विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या हमारा मैदानी स्तर का अमला (फॉरेस्ट गार्ड और रेंजर्स) इन खास मेहमानों की सुरक्षा और मॉनिटरिंग के लिए पूरी तरह से तैयार है?
इसी चुनौती को भांपते हुए इस विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया है। इस वर्कशॉप में कर्मचारियों को सिर्फ कागजी ज्ञान नहीं दिया जा रहा है, बल्कि ‘ग्राउंड-जीरो वॉरफेयर’ की तर्ज पर ‘वाइल्डलाइफ इंटेलिजेंस’ (Wildlife Intelligence) और ट्रैकिंग के आधुनिक गुर सिखाए जा रहे हैं।
ट्रेनिंग की खास बातें: क्या-क्या सीख रहा है मैदानी अमला?
इस दो दिवसीय वर्कशॉप में वनकर्मियों को एक आम इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक ‘शिकारी’ की नजर से जंगल को पढ़ना सिखाया जा रहा है:
- पगमार्क की सटीक पहचान: कर्मचारियों को सिर्फ पगमार्क (Pugmark) देखना ही नहीं, बल्कि यह बारीकी से पहचानना सिखाया जा रहा है कि पगमार्क नर (Male) बाघ का है या मादा (Female) का, और उसकी उम्र क्या हो सकती है।
- तेंदुए और बाघ में अंतर: अक्सर मैदानी अमला पगमार्क पहचानने में धोखा खा जाता है। इसे दूर करने के लिए लेपर्ड (तेंदुए) और टाइगर के ‘फील्ड साइन्स’ और पेड़ों पर मौजूद ‘स्क्रैच मार्क्स’ (Scratch Marks) में बारीक अंतर की क्लास ली गई।
- कैमरा ट्रैप और मुखबिर तंत्र: आधुनिक कैमरा ट्रैप तकनीक के सही इस्तेमाल के साथ-साथ जंगलों में मजबूत मुखबिर तंत्र (Informant Network) तैयार करने पर विशेष जोर दिया गया है, ताकि वन्यजीव तस्करों और शिकारियों के मंसूबों को समय रहते नेस्तनाबूद किया जा सके।
आज जंगलों में होगा ‘लाइव’ प्रैक्टिकल
वर्कशॉप के पहले दिन क्लासरूम में थ्योरी और परीक्षा का दौर चला। अब दूसरे दिन (3 अक्टूबर) वन विभाग का यह पूरा प्रशिक्षित अमला सीधे बस्तर के जंगलों में उतरेगा, जहां वे लाइव ट्रैकिंग (Live Tracking) और प्रैक्टिकल एक्सरसाइज के जरिए बाघों की सुरक्षा का मॉक ड्रिल करेंगे। बस्तर में बाघों के संरक्षण की दिशा में उठाया गया यह कदम भविष्य में वाइल्डलाइफ और इको-टूरिज्म के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।






