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Sirpur Chhattisgarh:सिरपुर (प्राचीन श्रीपुर): छत्तीसगढ़ का अद्वितीय सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहर

Sirpur Chhattisgarh:छत्तीसगढ़ का सिरपुर (प्राचीन नाम श्रीपुर) भारतीय इतिहास, वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का एक प्रमुख केंद्र रहा है। 7वीं शताब्दी में सोमवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के 57 वर्षीय सुदीर्घ शासनकाल में इस नगर ने अपनी वास्तुकला का स्वर्ण युग देखा।
स्वयं शैव मतावलंबी होने के बावजूद बालार्जुन ने बौद्ध धर्म को भरपूर संरक्षण दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं सदी में यहाँ की यात्रा की थी और अपने वृत्तांत में लिखा था कि यहाँ लगभग 100 बौद्ध विहार (संधाराम) थे, जिनमें महायान संप्रदाय के 10,000 भिक्षु निवास करते थे।
सिरपुर के प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर(Sirpur Chhattisgarh)
- लक्ष्मण मंदिर: लाल ईंटों से निर्मित यह भारत के सर्वश्रेष्ठ प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण लगभग 650 ईस्वी में महाशिवगुप्त की माता रानी वासटा (मगध नरेश सूर्यवर्मन की पुत्री) ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में करवाया था। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। इसके गर्भगृह में नागराज शेष की प्रतिमा है और प्रवेश द्वार पर दशावतार व कृष्ण लीला के दृश्य उकेरे गए हैं।
- राम मंदिर: लक्ष्मण मंदिर के पास ही स्थित यह भी ईंटों से बना मंदिर है। इसकी वास्तुकला ‘ताराकृति’ (स्टार-शेप्ड) आधार वाली है।
- गंधेश्वर मंदिर: महानदी के तट पर स्थित इस शिव मंदिर का प्राचीन नाम ‘गन्धर्वेश्वर’ था। यह आज भी पूजित है। इसका निर्माण प्राचीन खंडहरों से प्राप्त शिलाखंडों से किया गया है। इसके द्वार पर रावण के शीश पर ‘गर्दभमुख’ (गधे का सिर) का अनूठा अंकन है।
बौद्ध विहार और महाविहार
उत्खनन में सिरपुर से कई विशाल बौद्ध विहार प्रकाश में आए हैं, जो गुप्तकालीन वास्तुकला का सुंदर उदाहरण हैं:
- आनंदप्रभु कुटी विहार: महाशिवगुप्त के काल में भिक्षु आनंदप्रभु द्वारा निर्मित। इस दो मंजिला मठ में 14 कमरे थे और भगवान बुद्ध की 6.5 फुट ऊंची ‘भूमिस्पर्श मुद्रा’ वाली प्रतिमा स्थापित है।
- स्वास्तिक विहार: स्वस्तिक के आकार की तल योजना वाले इस विहार में भी बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा वाली प्रतिमा विराजमान है।
- तीवर देव महाविहार (सुरंग टीला परिसर): डॉ. अरुण कुमार शर्मा (2002-03) के निर्देशन में खोजा गया यह दक्षिण कोसल का सबसे बड़ा विहार (902 वर्ग मीटर) है। इसका अलंकृत प्रवेश द्वार अद्वितीय है, जिसमें हाथियों के पशु मैथुन दृश्य, पंचतंत्र की कथा (मगरमच्छ-वानर), मेढ़ों की लड़ाई और मंगोलियाई नैन-नक्श वाली नारी मूर्तियां उकेरी गई हैं।
उत्खनन में मिलीं दुर्लभ पुरातात्विक खोजें
एम.जी. दीक्षित और बाद में डॉ. अरुण कुमार शर्मा के नेतृत्व में हुए उत्खनन से सिरपुर के वैभव की कई परतें खुली हैं:
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार के साक्ष्य (सिक्के): उत्खनन में तीन प्रमुख सिक्के मिले— शरभपुरीय शासक ‘प्रसन्नमात्र’ का, कलचुरी शासक ‘रत्नदेव’ का और सबसे महत्वपूर्ण, 8वीं सदी के चीनी सम्राट ‘काई युवान’ (713-741 ई.) का सिक्का, जो चीन के साथ सीधे व्यापारिक संबंधों की पुष्टि करता है।
- राजमहल अवशेष: महानदी तट पर उत्खनन (2000-01) में एक विशाल राजमहल के अवशेष और विष्णु-लक्ष्मी की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।
- उत्कृष्ट धातु प्रतिमाएं: 7वीं-8वीं सदी में सिरपुर धातु प्रतिमा निर्माण का बड़ा केंद्र था। 1939 में यहाँ से बुद्ध, अवलोकितेश्वर, तारा, वज्रपाणि और विष्णु की उत्कृष्ट धातु प्रतिमाएं प्राप्त हुईं, जो आज रायपुर, दिल्ली और विदेशों (इंग्लैंड, अमेरिका) के संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं।
- पुरातत्व संग्रहालय: लक्ष्मण मंदिर परिसर में स्थित ASI संग्रहालय में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्म की मूर्तियां संरक्षित हैं। इनमें अंगड़ाई लेती नायिका, चतुर्मुख शिवलिंग और महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमाएं कला का उत्कृष्ट नमूना हैं।






