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CG Paddy Purchase: 1 नवंबर से धान खरीदी और 3358 रुपये प्रति क्विंटल की मांग, सरकार से सवाल

रायपुर। छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन की धान खरीदी (CG Paddy Purchase) शुरू होने से पहले तारीख और भुगतान दर को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई है। CG Paddy Purchase पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार से 1 नवंबर को उपार्जन शुरू करने और किसानों को 3358 रुपये प्रति क्विंटल देने की मांग की है। यह विपक्ष की मांग है, राज्य सरकार की नई घोषित खरीदी दर नहीं। बैज ने बारदानों, समितियों की वित्तीय तैयारी, भुगतान के प्रबंध और धान परिवहन के टेंडर पर भी सवाल उठाए हैं।

धान खरीदी 1 नवंबर से शुरू करने की मांग क्यों

दीपक बैज ने 10 अक्टूबर को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि छत्तीसगढ़ के अनेक किसान हरहुना किस्म का धान उगाते हैं। उनके अनुसार इस फसल की कटाई दशहरे के बाद और दीपावली से पहले आरंभ हो जाती है। यदि कटाई के समय सरकारी खरीदी केंद्र तैयार न हों तो किसानों को अपनी उपज रखने और उसके सुरक्षित परिवहन की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। इसी संदर्भ में उन्होंने सरकार से खरीदी का काम 1 नवंबर से शुरू करने का आग्रह किया।

यहां खरीदी शुरू करने की मांग और अधिकृत खरीदी कार्यक्रम के बीच अंतर समझना जरूरी है। समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसान पंजीयन, भूमि और किसान पहचान का मिलान, केंद्र आवंटन तथा निर्धारित तौल प्रक्रिया से गुजरते हैं। खरीदी की तारीख पर अंतिम स्थिति सरकार की अधिसूचना से ही स्पष्ट होगी। धान मंडी के व्यापार, निजी सौदों और सरकारी समर्थन मूल्य उपार्जन को एक जैसी व्यवस्था मानकर फैसला करना किसान के हित में नहीं है।

3358 रुपये का आंकड़ा कहां से आया

बैज ने अपने तर्क में कहा कि वर्ष 2023 के 3100 रुपये प्रति क्विंटल के वादे के बाद केंद्र के समर्थन मूल्य में कुल 258 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इसी गणना के आधार पर उन्होंने 3358 रुपये प्रति क्विंटल एकमुश्त भुगतान मांगा है। यह राजनीतिक पक्ष का प्रस्तुत हिसाब है। इसे अपने आप केंद्र की अधिसूचित एमएसपी या राज्य सरकार की अंतिम स्वीकृत दर बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। वास्तविक भुगतान की राशि राज्य की घोषित खरीद नीति और लागू शर्तों से तय होगी।

किसानों के लिए केवल प्रति क्विंटल भाव ही महत्वपूर्ण नहीं है। कुल बिक्री मात्रा, अधिकतम उपार्जन सीमा, समय पर तौल और खाते में रकम पहुंचने की अवधि भी सीधा फर्क डालती है। गन्ना खरीद मूल्य को लेकर हालिया घोषणा की तरह धान मामले में भी किसानों को मौखिक बयानों के बजाय अधिकृत आदेश और भुगतान की लिखित व्यवस्था देखनी चाहिए। अलग-अलग फसलों की दरें और उपार्जन नियम भी अलग होते हैं।

बारदाना, परिवहन और समिति फंड पर उठे सवाल

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का कहना है कि बारदानों की उपलब्धता, सहकारी समितियों के लिए फंड, भुगतान का बजट और धान उठाव के टेंडर की स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है। इन बिंदुओं को सरकार के खिलाफ लगाए गए सवालों के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर जिले में खरीद व्यवस्था असफल हो चुकी है। जिला स्तर पर केंद्रों की तैयारी, गोदामों की क्षमता और परिवहन अनुबंध की पुष्टि के लिए संबंधित प्रशासनिक रिकॉर्ड देखना जरूरी होगा।

खरीदी केंद्रों पर बारदानों की कमी होने पर तौल का काम प्रभावित हो सकता है, जबकि धान उठाव धीमा पड़ने से केंद्रों पर भंडारण का दबाव बढ़ता है। इन आशंकाओं की वजह से तैयारी की सार्वजनिक समीक्षा महत्वपूर्ण है। किसी केंद्र की वास्तविक स्थिति जांचते समय वहां उपलब्ध बोरे, तौल उपकरण, भुगतान सूची और परिवहन कार्यक्रम का आकलन होना चाहिए। प्रदेशव्यापी निष्कर्ष एक-दो शिकायतों से निकालना सही नहीं होगा।

खेत की लागत और नुकसान के दावे में फर्क

बैज ने पोटाश और एनपीके उर्वरकों के दाम बढ़ने का भी दावा किया तथा किसानों को प्रति एकड़ 5418 रुपये तक नुकसान होने की बात कही। यह दावा विपक्ष के गणित पर आधारित है। वास्तविक प्रति एकड़ लाभ या हानि उपज, बीज, खाद, सिंचाई, श्रम और विक्रय मूल्य पर निर्भर करती है। अलग-अलग जिलों के किसानों की लागत समान नहीं होती। इसीलिए राजनीतिक आंकड़े को हर किसान के बैंक खाते में होने वाला निश्चित नुकसान समझना उचित नहीं है।

किसानों को अभी क्या जांचना चाहिए

खरीफ 2026-27 के पंजीयन से जुड़ी जरूरी प्रविष्टियां, किसान पहचान और भूमि विवरण समय रहते जांचना उपयोगी होगा। यदि किसी रिकॉर्ड में नाम, खाता या रकबा गलत है तो निर्धारित सरकारी प्रक्रिया से सुधार कराना चाहिए। सरकार की ओर से खरीदी केंद्र और टोकन वितरण के अंतिम निर्देश मिलने पर ही तौल की योजना बनाएं। छत्तीसगढ़ की कृषि संबंधी खबरों में आने वाले बदलाव भी इसी कारण ध्यान देने योग्य हैं। कोई अनौपचारिक संदेश अंतिम आदेश का विकल्प नहीं हो सकता।

धान खरीदी के लिए आने वाले दिनों में सबसे महत्वपूर्ण दो आधिकारिक सूचनाएं होंगी। पहली, खरीदी शुरू और समाप्त करने की पक्की तारीख। दूसरी, किसानों को मिलने वाली दर और भुगतान की प्रकृति। राजनीतिक बहस में 3100 और 3358 रुपये के आंकड़े जरूर सामने हैं, लेकिन खरीद केंद्र पर लागू होने वाला फैसला केवल सरकार के लिखित नियम तय करेंगे। किसानों और समितियों को फिलहाल यही फर्क ध्यान में रखकर तैयारी करनी चाहिए।

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