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Kanker Conversion Row: कांकेर में ‘धर्मांतरण’ के नाम पर इतना बवाल क्यों?

ईसाई रीति-रिवाज से शव दफनाने का आदिवासी और हिंदू समाज ने किया विरोध

कांकेर। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बस्तर संभाग स्थित कांकेर (Kanker) जिले में धर्मांतरण (Religious Conversion) का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिले के कई गांवों में आदिवासी और हिंदू समुदाय ने धर्मांतरित ईसाई परिवारों द्वारा गांव की जमीन पर ईसाई रीति-रिवाज से शव दफनाने का कड़ा विरोध किया है। इस विवाद ने अब हिंसक रूप ले लिया है, जिसके चलते कई गांवों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

क्या है शव दफनाने का पूरा विवाद?

बस्तर अंचल के कांकेर जिले में पिछले कुछ समय से धर्मांतरण को लेकर माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है।

  • परंपरा और अधिकारों का टकराव: स्थानीय आदिवासी और हिंदू संगठनों का आरोप है कि जो लोग अपनी मूल आस्था और परंपराओं को छोड़कर ईसाई धर्म अपना चुके हैं, उन्हें गांव की सार्वजनिक जमीन (देवगुड़ी या श्मशान) पर शव दफनाने का अधिकार नहीं है।
  • अंतिम संस्कार की रस्में: ग्रामीण इस बात पर अड़े हैं कि गांव की सीमा के भीतर अंतिम संस्कार केवल आदिवासी और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार ही होना चाहिए। ईसाई धर्म के तहत दफनाने की प्रक्रिया का वे लोग पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

हिंसक झड़प और पुलिस प्रशासन का दखल

विवाद इतना गहरा गया कि कई गांवों में दोनों पक्षों के बीच हिंसक झड़पें और पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आई हैं:

  • शव निकालने पर अड़े ग्रामीण: कुछ मामलों में ग्रामीणों की उग्र भीड़ ने शव को कब्र से बाहर निकालने तक की मांग कर दी।
  • तनावपूर्ण माहौल: विवाद को शांत करने के लिए जिला प्रशासन और पुलिस (CG Police) को मोर्चा संभालना पड़ा है। गांवों में धारा 144 लागू करने के साथ ही बाहरी लोगों के प्रवेश पर भी पाबंदी लगा दी गई है।
  • सामाजिक बहिष्कार: इलाके के कई गांवों में धर्मांतरित परिवारों के सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) का मामला भी सामने आया है। स्थानीय प्रशासन लगातार दोनों पक्षों से बातचीत कर शांति बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।

सांस्कृतिक पहचान बचाने की लड़ाई

सर्व आदिवासी समाज और अन्य हिंदू संगठनों का तर्क है कि बड़े पैमाने पर हो रहा यह धर्मांतरण उनकी मूल सांस्कृतिक पहचान और मान्यताओं के लिए सीधा खतरा है। वे प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि धर्मांतरित लोगों के लिए गांव के बाहर अलग से जमीन की व्यवस्था की जाए, ताकि पारंपरिक रीति-रिवाजों का उल्लंघन न हो। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य में धर्मांतरण और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ दी है।

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