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Bengal Election 2026: वोटर लिस्ट से 65 चुनाव अधिकारियों के नाम ही गायब, SC ने कहा- ‘इस बार तो नहीं डाल पाएंगे वोट’

West Bengal Election 2026:पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 (West Bengal Election 2026) के बीच एक बेहद अजीब और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। राज्य में जिन अधिकारियों के कंधों पर शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी है, वे खुद अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाएंगे। दरअसल, पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची (Voter List) से उन 65 चुनाव अधिकारियों के नाम ही गायब हो गए हैं, जो चुनाव ड्यूटी पर तैनात हैं। इस मामले को लेकर जब याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंचे, तो अदालत ने सीधे तौर पर दखल देने से इनकार कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का दखल से इनकार, ट्रिब्यूनल जाने की सलाह

शुक्रवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने दलील दी कि 65 चुनाव अधिकारियों के नाम बिना कोई ठोस कारण बताए, मनमाने ढंग से वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं।
  • इन अधिकारियों के ड्यूटी आदेशों में उनके मतदाता पहचान पत्र (EPIC) नंबर स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, लेकिन सूची में उनके नाम नहीं हैं। इसका सीधा मतलब है कि जो लोग चुनाव करवा रहे हैं, वे खुद वोट नहीं दे सकते।
  • पीठ ने इस पर तुरंत राहत देने से इनकार कर दिया। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी दलीलें उन अपीलीय न्यायाधिकरणों (Appellate Tribunals) के समक्ष रखें, जिन्हें शीर्ष अदालत के आदेश पर ही ऐसी शिकायतों को सुनने के लिए बनाया गया है।
  • न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया, “यह सच है कि शायद वे इस मौजूदा चुनाव में वोट न दे सकें। लेकिन न्यायाधिकरण द्वारा भविष्य के लिए मतदाता सूची में उनका नाम बहाल करने का अधिकार सुरक्षित रखा जाएगा।”

आखिर क्यों कटे 27 लाख लोगों के नाम?

यह पूरा विवाद पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ा है।

  • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच अविश्वास को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को राज्य में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की जिम्मेदारी राज्य सरकार के बजाय न्यायिक अधिकारियों (जिला जजों और सेवानिवृत्त जजों) को सौंप दी थी।
  • इस काम के लिए लगभग 900 न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया था।
  • 16 अप्रैल तक इन अधिकारियों ने लगभग 60 लाख आपत्तियों का निपटारा किया, जिसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में 27 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर (Delete) कर दिए गए। इन्हीं कटे हुए नामों में चुनाव ड्यूटी पर तैनात 65 अधिकारी भी शामिल हैं।

27 लाख अपीलों में से सिर्फ 136 का निपटारा

सुप्रीम कोर्ट ने नाम कटने की शिकायतों को सुनने के लिए 19 अपीलीय न्यायाधिकरणों का गठन किया था। 13 अप्रैल को शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि जिन्हें चुनाव से 2 दिन पहले ट्रिब्यूनल से मंजूरी मिल जाएगी, वे वोट डाल सकेंगे। लेकिन कोर्ट को बताया गया कि न्यायाधिकरण बहुत धीमी गति से काम कर रहे हैं। 27 लाख अपीलों में से अब तक केवल 136 अपीलों पर ही अंतिम फैसला सुनाया जा सका है। इस पर सीजेआई ने कहा कि इस देरी के संबंध में कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से संपर्क किया जा सकता है।

रिकॉर्ड 91.78% वोटिंग पर सुप्रीम कोर्ट गदगद

इन सब विवादों के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण (23 अप्रैल) में हुई रिकॉर्ड वोटिंग और शांतिपूर्ण माहौल की जमकर तारीफ की। चुनाव आयोग के अनुसार, पहले चरण में 91.78% बंपर वोटिंग हुई है, जो आजादी के बाद से अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। सीजेआई सूर्यकांत और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस ऐतिहासिक आंकड़े और चुनाव में किसी भी बड़ी हिंसा के न होने पर खुशी जताई। पश्चिम बंगाल में अब दूसरे और अंतिम चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है।

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