
देश में एक देश-एक चुनाव (One Nation-One Election) लागू करने को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। 129वें संविधान संशोधन बिल पर बनी संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का मंथन लगातार जारी है। सोमवार को हुई JPC की अहम बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष के कई बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया। बड़ी खबर यह निकलकर आ रही है कि वन नेशन-वन इलेक्शन को 2034 के बजाय 2029 में ही लागू करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। JPC अध्यक्ष पीपी चौधरी के अनुसार, ज्यादातर स्टेकहोल्डर्स एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में हैं।
JPC की बैठक: किन दिग्गज नेताओं ने लिया हिस्सा?
वन नेशन-वन इलेक्शन बिल पर गठित JPC की सोमवार को हुई बैठक में कई प्रमुख विपक्षी चेहरों ने शिरकत की। बैठक की अध्यक्षता JPC चेयरमैन पीपी चौधरी (PP Chaudhary) ने की।
इस बैठक में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, पूर्व केंद्रीय मंत्री व कांग्रेस के सीनियर लीडर पी. चिदंबरम, TMC सांसद सागरिका घोष और NCP (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले भी शामिल हुईं। JPC चेयरमैन ने बताया कि पी. चिदंबरम ने बैठक में अपनी पार्टी का स्टैंड मजबूती से रखा। हालांकि, विपक्षी दल अभी भी एक साथ चुनाव का विरोध कर रहे हैं।
2034 नहीं, 2029 में ही लागू हो सकता है ONOE
हालिया रिपोर्ट्स और जेपीसी की बैठकों से यह संकेत मिल रहे हैं कि मोदी सरकार वन नेशन वन इलेक्शन को 2034 की जगह 2029 में ही लागू कर सकती है।
यानी 2029 में लोकसभा चुनावों के साथ ही सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं। JPC चेयरमैन पीपी चौधरी का कहना है कि अब तक जितने भी स्टेकहोल्डर्स से बात हुई है, उनमें से 99 प्रतिशत लोग वन नेशन-वन इलेक्शन चाहते हैं। उनका साफ कहना है कि “अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो इसे 2029 में ही लागू किया जा सकता है।”
क्या भारत में पहले होते थे एक साथ चुनाव?
भारत के लिए एक साथ चुनाव कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद शुरुआत में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते थे।
- वर्ष 1952, 1957 और 1962 के आम चुनाव विधानसभाओं के साथ ही संपन्न हुए थे।
- 1967 का चुनाव भी विधानसभाओं के साथ हुआ।
- चक्र कैसे टूटा? 1967 के बाद देश के कुछ राज्यों में विधानसभाएं समय से पहले भंग कर दी गईं और वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1972 के आम चुनाव भी समय से पहले कराए गए, जिसके कारण ‘एक देश-एक चुनाव’ का यह सुचारू चक्र टूट गया।
वन नेशन-वन इलेक्शन के फायदे (सरकार का तर्क)
सरकार और इस बिल के समर्थकों का कहना है कि देश की विकास दर को बढ़ाने के लिए यह बिल बेहद जरूरी है। इसके प्रमुख फायदे इस प्रकार गिनाए जा रहे हैं:
- आर्थिक लाभ: चुनावी खर्चे में भारी कमी आएगी।
- विकास में तेजी: GDP ग्रोथ में 1.5% की बढ़ोतरी का अनुमान है और महंगाई दर में आधा फीसदी (-0.50%) की कमी आ सकती है।
- प्रशासनिक कार्यक्षमता: बार-बार आचार संहिता (MCC) नहीं लगने से सरकारी योजनाएं समय से लागू होंगी और विकास कार्य नहीं रुकेंगे।
- शिक्षा पर प्रभाव: सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की ड्यूटी चुनाव में लगने से बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है, इससे राहत मिलेगी।
विपक्ष क्यों कर रहा है कड़ा विरोध?
विपक्षी दलों ने इस बिल के खिलाफ कुछ सैद्धांतिक और संवैधानिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं:
- हर 5 साल पर चुनाव कराना एक संवैधानिक बाध्यता है।
- अगर कोई राज्य सरकार 2 साल में गिर गई, तो बाकी बचे 3 साल के लिए क्या होगा?
- सरकार गिरने पर अगले चुनाव तक राज्य में लंबा ‘राष्ट्रपति शासन’ लगाना लोकतांत्रिक रूप से उचित नहीं है।
- नए चुनाव होने पर विधानसभा का कार्यकाल केवल बचे हुए समय (जैसे 3 साल) के लिए तय करना गलत है।
2029 में ONOE लागू हुआ तो राज्यों की विधानसभाओं पर क्या पड़ेगा असर?
अगर 2029 में पूरे देश में एक साथ चुनाव होते हैं, तो अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में बड़ी कटौती करनी पड़ेगी। स्थिति कुछ इस प्रकार होगी:
| चुनाव वर्ष (वर्तमान) | विधानसभा का निर्धारित कार्यकाल | 2029 में ONOE लागू होने पर असर | प्रभावित होने वाले प्रमुख राज्य |
| 2028 | 2033 तक | विधानसभा को 4 साल पहले भंग करना पड़ेगा। | मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम (कुल 9 राज्य) |
| 2027 | 2032 तक | विधानसभा को 3 साल पहले भंग करना पड़ेगा। | उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात, मणिपुर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश (कुल 7 राज्य) |
| 2026 | 2031 तक | विधानसभा को 2 साल पहले भंग करना पड़ेगा। | तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम, पुडुचेरी (कुल 5 राज्य) |
| 2025 | 2030 तक | विधानसभा को 1 साल पहले भंग करना पड़ेगा। | दिल्ली और बिहार |
| 2029 | 2034 तक | कोई खास असर नहीं पड़ेगा, चुनाव सिंक हो जाएंगे। | महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल (कुल 8 राज्य) |






