CG Bureaucracy vs Leaders: छत्तीसगढ़ में बेलगाम अफसरशाही, 19 सरकारी आदेशों के बाद भी सांसदों का अपमान!

छत्तीसगढ़ में सरकार और प्रशासन के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। (CG Bureaucracy vs Leaders) प्रदेश में अफसरशाही को लेकर अब केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के नेता भी मुखर होकर सवाल उठा रहे हैं। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के बीच हुए हालिया विवाद ने सरकार को पहले ही असहज स्थिति में डाल रखा था। अब इस आग में घी का काम दुर्ग सांसद विजय बघेल के उस कदम ने किया है, जिसमें उन्होंने राज्य के दो बड़े अधिकारियों के खिलाफ सीधे लोकसभा सचिवालय को शिकायत भेज दी है। यह मामला अब किसी एक नेता का व्यक्तिगत विवाद नहीं रह गया है, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
19 सरकारी आदेश, फिर भी हालात जस के तस, CG Bureaucracy vs Leaders
अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच यह टकराव कोई नई बात नहीं है। राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग के रिकॉर्ड खंगालने पर पता चलता है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से, यानी साल 2001 से लेकर 2010 तक, कम से कम 19 बार ऐसे आदेश और निर्देश जारी किए जा चुके हैं, जिनमें अफसरों को जनप्रतिनिधियों का सम्मान करने की सख्त हिदायत दी गई थी।
CG Bureaucracy vs Leaders: हर आदेश में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया जाए, उनके पत्रों का समय पर जवाब दिया जाए और सरकारी कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन हो। विडंबना यह है कि हर नए आदेश के बाद कुछ दिन सुधार दिखता है और फिर से वही पुरानी मनमानी शुरू हो जाती है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि जब 19 चेतावनियां भी बेअसर साबित हुईं, तो आखिर इस बेलगाम अफसरशाही के लिए जिम्मेदार कौन है?
ज़रूरी बात…CG Bureaucracy vs Leaders
- छत्तीसगढ़ में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
- सांसद बृजमोहन अग्रवाल और सचिव अमित कटारिया के बीच विवाद सुर्खियों में है।
- सांसद विजय बघेल ने 2 अधिकारियों की शिकायत सीधे लोकसभा सचिवालय से की है।
- साल 2001 से 2010 के बीच अफसरों को प्रोटोकॉल सिखाने के लिए 19 आदेश जारी हो चुके हैं।
- सरकारी नियम के तहत सांसदों और विधायकों के पत्रों का जवाब 15 दिन में देना अनिवार्य है।
- विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और पूर्व सीएम भूपेश बघेल भी अफसरशाही पर कड़ी नाराजगी जता चुके हैं।
15 दिन का नियम फाइलों में हुआ दफन
सरकारी आदेशों की फेहरिस्त में एक नियम बेहद स्पष्ट है, सांसदों और विधायकों के किसी भी पत्र का जवाब हर हाल में 15 दिन के भीतर दिया जाए। नियम यहां तक कहता है कि पत्र मिलते ही उसकी तत्काल अभिस्वीकृति (Acknowledgement) भेजी जाए। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
जनप्रतिनिधियों की लगातार यह शिकायत रही है कि जनहित के मुद्दों पर लिखे गए उनके पत्र महीनों तक फाइलों में धूल फांकते रहते हैं। (CG Bureaucracy vs Leaders) कई बार अधिकारी फोन तक उठाना जरूरी नहीं समझते। विकास कार्यों के अहम प्रस्ताव लंबित रख दिए जाते हैं। विवाद सिर्फ पत्राचार तक सीमित नहीं है। कई बार स्थानीय विधायकों या सांसदों को सरकारी कार्यक्रमों का न्योता ही नहीं दिया जाता और अगर बुलाया भी जाता है, तो लोकार्पण की शिलापट्ट से उनका नाम गायब कर दिया जाता है।
मंच से लेकर सदन तक गूंज रही नाराजगी
अफसरशाही की इस कार्यप्रणाली का असर हाल ही में बेमेतरा में आयोजित मुख्यमंत्री कन्या विवाह समारोह में देखने को मिला। मंच पर मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्री और छत्तीसगढ़ विधानसभा के अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेताओं की मौजूदगी के बावजूद स्वागत और बैठने की व्यवस्था बेहद लचर थी। इस पर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने मंच से ही कलेक्टर और एसपी को कड़ी फटकार लगाई। (CG Bureaucracy vs Leaders) उन्होंने दो टूक कहा कि अपने 15 साल के मुख्यमंत्रित्व काल में भी उन्होंने ऐसी अव्यवस्था कभी नहीं देखी।
यही नजारा हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा के बजट सत्र में भी दिखा। अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण विभागों के वरिष्ठ अधिकारी सदन से ही नदारद थे। इस घोर लापरवाही पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अधिकारियों की जवाबदेही खत्म होती जा रही है और पूरे प्रदेश में अफसरशाही हावी हो गई है। (CG Bureaucracy vs Leaders) विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को जमकर घेरा। जब सत्ता और विपक्ष दोनों ही एक सुर में सिस्टम पर सवाल उठा रहे हों, तो सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इन 19 आदेशों को फाइलों से निकालकर जमीन पर लागू कराने की है।






