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छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण का सच: सरगुजा और बस्तर के आदिवासी गांवों की बदलती तस्वीर

क्या आपने कभी सोचा है कि सदियों से अपनी पारंपरिक संस्कृति और प्रकृति की पूजा करने वाले आदिवासी अचानक अपनी जड़ें क्यों छोड़ रहे हैं. दरअसल इन दिनों छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण का मुद्दा एक बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का कारण बन रहा है. सरगुजा और बस्तर संभाग के दूरदराज के आदिवासी गांवों में एक खामोश लेकिन बेहद तेज बदलाव की लहर चल रही है. जहां पहले केवल आदिवासियों के देवगुड़ी और हिंदू मंदिर दिखाई देते थे, वहां अब चर्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इसके परिणामस्वरूप कई गांवों की पूरी धार्मिक और सामाजिक पहचान ही बदल गई है.

जशपुर और अंबिकापुर में तेजी से बदल रहे हालात

हालांकि यह बदलाव रातोंरात नहीं हुआ है. जशपुर जिला लंबे समय से ईसाई मिशनरियों का एक प्रमुख केंद्र रहा है. यहां कुनकुरी में एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रोमन कैथोलिक चर्च मौजूद है. इसके अलावा अंबिकापुर के बेहरापारा जैसे गांवों के आंकड़े हैरान करने वाले हैं. यहां पिछले एक दशक में अधिकांश परिवारों ने ईसाई धर्म अपना लिया है. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक बेलजौरा और सीतापुर में उरांव जनजाति के साठ प्रतिशत से ज्यादा लोग धर्मांतरित हो चुके हैं. इसलिए अब इन इलाकों में नए चर्चों का निर्माण तेजी से हो रहा है और कई जगहों पर तो एक भी पुराना मंदिर नहीं बचा है.

सेवा बनाम प्रलोभन का गहराता विवाद

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर दो अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं. ईसाई समुदाय और उनसे जुड़े संगठनों का कहना है कि वे केवल स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों की सेवा का काम कर रहे हैं और धर्म परिवर्तन पूरी तरह से लोगों की व्यक्तिगत आस्था का विषय है. इसके विपरीत हिंदू संगठनों और स्थानीय प्रशासन का मानना है कि इसके पीछे प्रलोभन, चंगाई सभाओं का भ्रम और विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ की बड़ी भूमिका है. दरअसल बस्तर से लेकर सरगुजा तक दर्जनों ऐसे एनजीओ सक्रिय हैं जिन पर इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं.

बस्तर में बढ़ता सामाजिक तनाव और घर वापसी

परिणामस्वरूप इस पूरे घटनाक्रम ने कई इलाकों में भारी सामाजिक तनाव पैदा कर दिया है. बस्तर संभाग के नारायणपुर और कांकेर में शव दफनाने को लेकर आदिवासियों और धर्मांतरित ईसाइयों के बीच कई बार हिंसक टकराव देखने को मिले हैं. इसके अलावा अब जशपुर और आसपास के इलाकों में घर वापसी का अभियान भी जोर पकड़ रहा है. हाल ही में आयोजित रामकथा और जागरण कार्यक्रमों के जरिए बारह सौ से ज्यादा परिवारों ने अपने मूल धर्म में वापसी की है. वहीं राज्य सरकार भी अब धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत सख्त कदम उठा रही है ताकि आदिवासी संस्कृति को बचाया जा सके.

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