रायपुर में 20 हजार से ज्यादा सूबबुल पेड़ हटाने की तैयारी, 21 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए टेंडर जारी

रायपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र के करीब 21 हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुके 20 हजार से अधिक सूबबुल पेड़ों को हटाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए टेंडर जारी किया गया है। योजना केवल पेड़ों को काटने तक सीमित नहीं है। विभाग के मुताबिक जड़ों को भी हटाया जाएगा, ताकि सूबबुल दोबारा उसी क्षेत्र में तेजी से न फैल सके। इसके बाद खाली जमीन पर स्थानीय, औषधीय, फलदार और छायादार प्रजातियों के पौधों के रोपण की योजना है।
Subabul Trees Raipur: 5 हेक्टेयर से फैलकर 21 हेक्टेयर तक पहुंचे
जानकारी के मुताबिक सूबबुल को करीब डेढ़ दशक पहले लगभग 5 हेक्टेयर क्षेत्र में लगाया गया था। समय के साथ इसका विस्तार बढ़ता गया और अब यह लगभग 21 हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है। वन अनुसंधान केंद्र का पूरा परिसर करीब 63 हेक्टेयर का बताया गया है। यानी परिसर के बड़े हिस्से में अब इस एक प्रजाति की मौजूदगी हो गई है।
विभाग के सामने मुख्य चिंता स्थानीय वनस्पतियों के लिए जगह और परिस्थितियां तैयार करने की है। घने पेड़ों की वजह से जमीन की सतह तक पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंचने और छोटे स्थानीय पौधों तथा जड़ी-बूटियों के प्राकृतिक विकास पर असर पड़ने की बात कही गई है।
जड़ों को भी हटाने की योजना
सूबबुल की विशेषता यह है कि कटाई के बाद भी जड़ों से दोबारा वृद्धि हो सकती है। इसी वजह से योजना में केवल तने काटना पर्याप्त नहीं माना गया है। केंद्र के संचालक कौशलेंद्र कुमार के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि कटाई पूरी होने के बाद जड़ों का भी उन्मूलन किया जाएगा। इसके बाद नई प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे।
यह चरण महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को हटाने के बाद खाली क्षेत्र के पुनर्वनीकरण का तरीका ही तय करेगा कि भविष्य में परिसर की वनस्पति संरचना किस दिशा में जाती है।
पानी सोखने को लेकर भी चर्चा
रिपोर्ट में वनस्पति जानकारों के हवाले से कहा गया है कि सूबबुल की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं और पानी ग्रहण करती हैं। साथ ही इस प्रजाति की कुछ सकारात्मक विशेषताओं का भी उल्लेख है। यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद कर सकती है और इसकी पत्तियां मिट्टी में जैविक पदार्थ जोड़ती हैं। यानी मामला किसी पेड़ को केवल “अच्छा” या “खराब” बताने का नहीं, बल्कि किसी विशेष स्थान पर उसके अत्यधिक विस्तार और स्थानीय जैव विविधता पर संभावित प्रभाव का है।
इसीलिए वन अनुसंधान केंद्र की प्रस्तावित कार्रवाई को एक प्रजाति के प्रभुत्व को कम कर स्थानीय विविधता बढ़ाने की प्रबंधन कवायद के रूप में देखा जा रहा है।
अब किन पौधों को प्राथमिकता?
विभागीय योजना में विलुप्तप्राय या कम होती स्थानीय प्रजातियों के साथ औषधीय, फलदार और छायादार पौधों के रोपण की बात कही गई है। लेकिन वास्तविक परिणाम के लिए केवल पौधारोपण की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होगी। पौधों का चयन, मिट्टी की स्थिति, सिंचाई, सुरक्षा और कई वर्षों तक उनकी जीवित रहने की दर अधिक अहम होगी।
केंद्र वन अनुसंधान और प्रशिक्षण से जुड़ा संस्थान है, इसलिए यहां होने वाला पुनर्वनीकरण भविष्य में स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और प्रदर्शन क्षेत्र के रूप में भी महत्व रख सकता है।
कब शुरू हो सकती है कटाई?
रिपोर्ट के अनुसार टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस महीने के अंत या अगले महीने से काम शुरू होने की संभावना जताई गई है। हालांकि वास्तविक शुरुआत टेंडर प्रक्रिया और विभागीय कार्ययोजना पर निर्भर करेगी।
20 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई स्वाभाविक रूप से बड़ा आंकड़ा है। ऐसे में आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कितने पेड़ वास्तव में हटाए जाते हैं, लकड़ी का निस्तारण किस तरह होता है, कितने नए स्थानीय पौधे लगाए जाते हैं और रोपण के बाद उनकी निगरानी की क्या व्यवस्था बनाई जाती है।






