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Diljit Dosanjh Punjab 95: रिलीज के 2 दिन बाद ही OTT से हटी दिलजीत की ‘सतलुज’; कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा जिन पर बनी है विवादित फिल्म?

Entertainment News: पंजाबी और बॉलीवुड के सुपरस्टार दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh Punjab 95) की लंबे समय से अटकी हुई विवादित फिल्म ‘पंजाब 95’ रिलीज होते ही एक बार फिर विवादों में घिर गई है।

हाल ही में इस फिल्म को ZEE5 (जी-5) पर नए शीर्षक ‘सतलुज’ (Satluj) के नाम से बिना किसी काट-छांट के रिलीज किया गया था। लेकिन, रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। रविवार को ZEE5 ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि यह फिल्म अब भारत में दर्शकों के लिए उपलब्ध नहीं है।

खबर की मुख्य बातें (Highlights)

  • 2 दिन में हटी फिल्म: ‘पंजाब 95’ का नाम बदलकर ‘सतलुज’ रखा गया था, जिसे ZEE5 ने हटा लिया है।
  • जसवंत सिंह खालड़ा पर आधारित: यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की जिंदगी पर बनी है।
  • सिख दंगों के बाद की कहानी: फिल्म में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पंजाब के हालातों को दिखाया गया है।
  • क्यों हुआ विवाद: फिल्म पर पुलिस की ज्यादती और कस्टोडियल डेथ के गंभीर आरोप दिखाने का दावा है।

पंजाब में लापता लोगों और ‘लावारिस लाशों’ का सच

दरअसल, यह फिल्म 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों और उसके बाद पंजाब के हालातों पर आधारित है। दावों के मुताबिक, पंजाब में पुलिस, आर्मी और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती के बीच कई लोगों को उनके घरों से उठाया गया। बहुत से लोग कस्टडी (हिरासत) में प्रताड़ित किए गए और मारे गए। पहचान छिपाने के लिए कस्टडी में मारे गए लोगों के चेहरे जला दिए जाते थे और उन्हें लावारिस लाश बताकर श्मशान में जला या दफना दिया जाता था।

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कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? (Jaswant Singh Khalra Story)

इसी खौफनाक दौर में एक मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा आगे आए। खालड़ा इस बात की तहकीकात कर रहे थे कि पंजाब के गांवों से अचानक नौजवान कैसे लापता हो रहे हैं। पुलिस उन्हें कहां ले जाती है? तलाश करते-करते जब वे श्मशान घाट पहुंचे, तो पैरों तले जमीन खिसक गई।

उन्हें पता चला कि वहां हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया गया है। साल 1995 में खालड़ा ने यह मुद्दा कनाडा की पार्लियामेंट तक पहुंचा दिया, जिससे यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंजने लगा।

दिनदहाड़े खालड़ा का अपहरण और बेरहम मौत

इस खुलासे के बाद 6 सितंबर 1995 को पंजाब पुलिस ने दिनदहाड़े खालड़ा को उनके घर से उठा लिया। वे फिर कभी घर नहीं लौटे। कई सालों बाद एक स्पेशल पुलिस अफसर (कुलदीप सिंह) ने CBI को बताया कि पुलिस हिरासत में जसवंत सिंह को इतनी यातनाएं दी गईं कि 24 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई।

चौंकाने वाली बात यह थी कि मौत के बाद उनकी लाश के टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें सतलुज नदी में फेंक दिया गया था। (शायद इसीलिए फिल्म का नया नाम ‘सतलुज’ रखा गया था)।

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6 पुलिसवालों को हुई उम्रकैद

जसवंत सिंह खालड़ा एक क्रांतिकारी परिवार से थे। उनके दादा हरनाम सिंह ‘गदर आंदोलन’ के संस्थापकों में से एक थे। खालड़ा के लापता होने के बाद एक लंबी कानूनी लड़ाई चली।

साल 2005 में इस हत्याकांड में 6 पुलिसवालों को दोषी ठहराया गया। बाद में 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन सभी दोषियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। इसी संवेदनशील और राजनीतिक रूप से विवादित मुद्दे के कारण दिलजीत दोसांझ की यह फिल्म (Diljit Dosanjh Punjab 95) रिलीज के साथ ही सेंसरशिप और विवादों के पचड़े में फंस गई है।

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