Chhattisgarh Tiger Population 2026: प्रदेश में 35 बाघ और 355 हाथी, संरक्षण के लिए विशेष कार्ययोजना
रायपुर। छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण को लेकर राज्य सरकार ने बाघ और हाथियों की बढ़ती मौजूदगी के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती पर फोकस बढ़ाया है। वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के अनुसार प्रदेश में बाघों की संख्या बढ़कर 35 हो गई है, जबकि राज्य में करीब 355 हाथियों की मौजूदगी बताई गई है। वन विभाग अब इनके संरक्षण, सुरक्षित आवास, निगरानी और आबादी वाले क्षेत्रों में संघर्ष की घटनाएं कम करने के लिए विशेष कार्ययोजना पर काम कर रहा है।
Chhattisgarh Tiger Population 2026: चार साल में 18 से 35 तक पहुंची संख्या
वनमंत्री के अनुसार वर्ष 2022 में छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या 18 थी, जो अब बढ़कर 35 बताई जा रही है। यानी चार वर्षों में संख्या में करीब 94 प्रतिशत वृद्धि का दावा किया गया है। राज्य सरकार इसे वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर प्रस्तुत कर रही है।
इस बढ़ोतरी के साथ चुनौती केवल बाघों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि उनके लिए पर्याप्त सुरक्षित क्षेत्र, शिकार आधार, जलस्रोत और जंगलों के बीच आवाजाही के प्राकृतिक कॉरिडोर सुरक्षित रखने की भी है। बाघों की आबादी बढ़ने पर उनके मूवमेंट क्षेत्र में भी विस्तार होता है और कई बार यह वन सीमा से लगे गांवों तक पहुंच सकता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वनमंत्री ने बताया कि नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने बांधवगढ़ से तीन बाघिनों के स्थानांतरण की मंजूरी दी है। इनके लिए आवश्यक बाड़े और पेट्रोलिंग कैंप तैयार किए जा रहे हैं और मानसून के बाद स्थानांतरण प्रस्तावित है।
गुरु घासीदास-तमोर पिंगला पर भी नजर
छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024 में अधिसूचित गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिजर्व का क्षेत्रफल करीब 2,829.387 वर्ग किलोमीटर है। इसे देश के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व में शामिल किया जाता है। बड़े लैंडस्केप के कारण राज्य की भावी बाघ संरक्षण रणनीति में इस क्षेत्र की अहम भूमिका मानी जा रही है।
प्रदेश में बाघों की संख्या का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक मध्य भारत के दूसरे राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ में बाघ आबादी अपेक्षाकृत कम रही। अब सरकार का दावा है कि संरक्षण उपायों, निगरानी और आवास प्रबंधन से स्थिति में बदलाव आया है।
राज्य में 355 हाथी, संघर्ष रोकना बड़ी चुनौती
बाघों के साथ छत्तीसगढ़ में हाथियों की मौजूदगी वन विभाग के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है। वनमंत्री ने प्रदेश में करीब 355 हाथियों की मौजूदगी की जानकारी दी है। हाथी प्रभावित इलाकों में मानव-हाथी संघर्ष के मामले लगातार प्रशासन और वन विभाग की प्राथमिकता में रहते हैं।
सरगुजा और उत्तरी छत्तीसगढ़ के साथ रायगढ़, धरमजयगढ़, कोरबा तथा आसपास के वन क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही का लंबा इतिहास रहा है। समस्या तब गंभीर होती है जब हाथियों के पारंपरिक रास्तों के आसपास आबादी, कृषि क्षेत्र या दूसरी गतिविधियां बढ़ती हैं।
इसी कारण केवल हाथियों की संख्या जानना पर्याप्त नहीं है। उनके मूवमेंट रूट की मैपिंग, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, प्रभावित गांवों को समय पर जानकारी और फसल अथवा संपत्ति नुकसान के बाद सहायता की व्यवस्था भी संरक्षण नीति का हिस्सा बनती है।
572 देवगुड़ियों पर हुआ काम
वनमंत्री ने विभागीय उपलब्धियों की जानकारी देते हुए बताया कि बस्तर की आदिम संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी 572 देवगुड़ियों के निर्माण तथा जीर्णोद्धार पर पिछले ढाई वर्षों में 19 करोड़ 5 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। सरकार वन संरक्षण को केवल पेड़ और वन्यजीव तक सीमित रखने के बजाय वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की संस्कृति और आजीविका से जोड़कर देखने की बात कर रही है।
7.14 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को प्रोत्साहन राशि
वनमंत्री के मुताबिक प्रदेश में तेंदूपत्ता संग्रहण दर 5,500 रुपये प्रति मानक बोरा निर्धारित है। करीब 7 लाख 14 हजार संग्राहकों को 153 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन पारिश्रमिक राशि दी गई है। महिला मुखिया संग्राहकों को 12 लाख 40 हजार जोड़ी चरण पादुका वितरित करने और विद्यार्थियों को 12 करोड़ रुपये से अधिक की छात्रवृत्ति देने की जानकारी भी दी गई।
वनोपज के क्षेत्र में समर्थन मूल्य पर 36,580 क्विंटल उपज खरीदने और इसके बदले संग्राहकों को 16.66 करोड़ रुपये भुगतान किए जाने का दावा किया गया है। वन धन विकास केंद्रों के जरिए 181 हर्बल उत्पाद तैयार किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
425 नए गांव बस सेवा से जुड़े
वन विभाग के साथ परिवहन विभाग की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि प्रदेश के 425 नए गांवों को बस सेवा से जोड़ा गया है। इसके अलावा परिवहन सेवाओं के डिजिटलीकरण के तहत आरसी और ड्राइविंग लाइसेंस की होम डिलीवरी जैसी सुविधाओं को विस्तार दिया गया है।
अब राज्य की वन्यजीव नीति की वास्तविक परीक्षा इस बात से होगी कि बढ़ती बाघ और हाथी आबादी के साथ जंगलों और आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है। खास तौर पर बाघिनों के प्रस्तावित स्थानांतरण, हाथी कॉरिडोर प्रबंधन और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी आने वाले समय में प्रमुख संकेतक होंगे।






