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CGPSC केस में ED की 3700 पन्नों की शिकायत: 3.28 करोड़ की मनी ट्रेल के दावे में क्या-क्या है?

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की 2020 और 2021 राज्य सेवा परीक्षाओं से जुड़े कथित प्रश्नपत्र लीक, चयन में अनियमितता और भ्रष्टाचार के मामले में प्रवर्तन निदेशालय की जांच अब विस्तृत अभियोजन शिकायत के चरण तक पहुंच गई है। 23 सितंबर को सुबह 10:51 बजे प्रकाशित और 10:57 बजे अपडेट रिपोर्ट के अनुसार ED ने रायपुर की विशेष PMLA अदालत में सात आरोपितों के खिलाफ करीब 3700 पन्नों की अभियोजन शिकायत पेश की है। एजेंसी ने इस मामले में करीब 3.28 करोड़ रुपये को कथित अपराध आय से जोड़ने का दावा किया है।

यह लेख उपलब्ध दस्तावेजी दावों का विश्लेषण है। आरोपों की अंतिम सत्यता अदालत में साक्ष्यों की जांच और बचाव पक्ष की दलीलों के बाद ही तय होगी।

3.28 करोड़ का आंकड़ा कैसे बना?

रिपोर्ट के अनुसार ED ने करीब 3.28 करोड़ रुपये की कथित अपराध आय चिन्हित करने की बात कही है। एजेंसी का दावा है कि अभ्यर्थियों और उनके परिवारों से जुटाए गए 3.13 करोड़ रुपये में से 2.83 करोड़ रुपये तथा CSR के रास्ते मिली बताई गई 45 लाख रुपये की राशि को जांच में जोड़ा गया है।

यहां 3.28 करोड़ रुपये को किसी अदालत द्वारा सिद्ध अवैध आय मानना अभी उचित नहीं होगा। यह जांच एजेंसी की अभियोजन शिकायत में प्रस्तुत कथित मनी ट्रेल है।

सात लोगों को शिकायत में आरोपी बनाया गया

रिपोर्ट के अनुसार शिकायत में तत्कालीन CGPSC अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी, तत्कालीन मुख्यमंत्री कार्यालय के OSD चेतन कुमार बोरघरिया, उत्कर्ष चंद्राकर, अनिल चंद्राकर, श्रवण कुमार गोयल, ललित गणवीर और डॉ. विकास चंद्राकर के नाम शामिल हैं। एजेंसी ने अलग-अलग व्यक्तियों की अलग भूमिका होने का दावा किया है।

ED की आधिकारिक वेबसाइट पर सितंबर की शुरुआत में जारी प्रेस रिलीज में भी CGPSC भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक और भ्रष्टाचार से जुड़ी PMLA जांच के दौरान उत्कर्ष चंद्राकर की गिरफ्तारी और रायपुर, दुर्ग व जशपुर में तलाशी की जानकारी दी गई थी।

CSR के 45 लाख रुपये पर क्यों ध्यान?

जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 45 लाख रुपये की CSR राशि है। ED ने दावा किया है कि इस भुगतान और परीक्षा में कथित लाभ के बीच संबंध की जांच की गई है। रिपोर्ट में श्री बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड के निदेशक श्रवण कुमार गोयल और ग्रामीण विकास समिति से जुड़े भुगतान का उल्लेख है।

किसी कंपनी का CSR भुगतान अपने-आप में अनियमित नहीं होता। आरोप का सवाल इस बात पर निर्भर करेगा कि भुगतान का वास्तविक उद्देश्य क्या था, किस प्रक्रिया से स्वीकृति हुई और उसके बदले किसी का सवाल इस बात पर निर्भर करेगा कि भुगतान का वास्तविक उद्देश्य क्या था, किस प्रक्रिया से स्वीकृति हुई और उसके बदले किसी प्रकार का अनुचित लाभ दिए जाने के साक्ष्य हैं या नहीं।

बैंक खातों में नकद जमा की जांच

अभियोजन शिकायत से संबंधित रिपोर्ट में उत्कर्ष चंद्राकर के एक बैंक खाते में 72.18 लाख रुपये से अधिक के नकद क्रेडिट और चेतन बोरघरिया से जुड़े खातों में करीब 71.15 लाखेख किया गया है। एजेंसी इन लेनदेन के स्रोत और कथित नेटवर्क से संबंध की जांच का हिस्सा बता रही है।

बैंक खाते में नकद जमा होना अकेले अपराध का प्रमाण नहीं है। अदालत में अभियोजन को यह दिखाना होगा कि संबंधित राशि कथित अनुसूचित अपराध से उत्पन्न हुई और धनशोधन की प्रक्रिया से उसका कानूनी संबंध बनता है।

प्रश्नपत्र पहले मिलने का भी आरोप

ED की शिकायत के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट में आरोप है कि कुछ अभ्यर्थियों से पद और चयन के लिए 50 से 60 लाख रुपये तक मांगे या लिए गए तथा कुछ लोगों को प्रश्नपत्र पहले उपलब्ध कर रायपुर के एक मैरिज पैलेस और बारनवापारा क्षेत्र के एक रिसॉर्ट का भी कथित घटनाक्रम में उल्लेख है।

ये गंभीर आरोप हैं, लेकिन इन्हें स्थापित तथ्य की तरह प्रकाशित करना कानूनी दृष्टि से गलत होगा। संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि अब न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्य, डिजिटल रिकॉर्ड, गवाहों और बचाव पक्ष की जिरह से होगी।

छह संपत्तियों की अस्थायी कुर्की

रिपोर्ट के अनुसार ED ने 21 सितंबर को करीब 47.54 लाख रुपये मूल्य की छह nal attachment की है। इनमें धमतरी, रायपुर और दुर्ग की कृषि भूमि तथा आवासीय भूखंडों का उल्लेख है।

PMLA के तहत provisional attachment अंतिम जब्ती नहीं होती। इसके लिए आगे वैधानिक प्रक्रिया होती है और संबंधित पक्ष को अपने अधिकारों और संपत्ति के स्रोत के समर्थन में जवाब देने का अवसर मिलता है।

इस मामले में अब निर्णायक क्या होगा?

अब केवल आरोपपत्र के पन्नों की संख्या बड़ी खबर नहीं है। असली कसौटी यह होगी कि ED की मनी ट्रेल को अदालत में दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल बातचीत और गवाहों से किस हद तक साबित किया जा सकता है।

दूसरा सवाल कथित प्रश्नपत्र पहुंचने की श्रृंखला का है, पेपर कहां से निकला, किसके पास गया और किन अभ्यर्थियों तक पहुंचा। तीसरा, कथित भुगतान और वास्तविक चयन के बीच प्रमाणित संबंध स्थापित होता है या नहीं।

CGPSC जैसे संवैधानिक भर्ती संस्थान से जुड़े मामले में उम्मीदवारों का भरोसा सबसे बड़ा मुद्दा है। इसलिए जांच एजेंसी के आरोप जितने गंभीर हैं, उतना ही जरूरी है कि निष्कर्ष केवल न्यायिक रूप से परखे गए साक्ष्यों पर आधारित हों।

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