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CG High Court Live in Relationship: शादी से इनकार रेप नहीं, जानिए 30 लाख के समझौते और फैसले का पूरा सच

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 29 जून को लिव-इन रिलेशनशिप (CG High Court Live in Relationship) और उससे जुड़े मुकदमों पर 1 बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब 2 बालिग लोग लंबे समय से लिव-इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) में रह रहे हों, तो कानून यह मानकर चलता है कि उनके बीच शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बने थे। ऐसे में अगर बाद में पुरुष किसी कारण से महिला से शादी करने से इनकार कर देता है, तो उस शारीरिक संबंध को रेप (बलात्कार) नहीं माना जाएगा।

जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला दिया है।

भिलाई की 40 वर्षीय महिला का मामला

दरअसल, यह पूरा मामला भिलाई नगर निगम में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में काम करने वाली 40 साल की एक महिला की याचिका से जुड़ा है। महिला ने अपनी याचिका में बताया था कि साल 2019 में रायपुर में एमबीए कोर्स के दौरान उसकी मुलाकात आरोपी शख्स से हुई थी। इसके बाद वे 2 साल तक एक साथ लिव-इन में रहे। महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी का वादा किया था, लेकिन एमबीए खत्म होने के बाद वह शादी से बचने लगा।

लड़के ने शादी से इनकार करने का कारण यह बताया कि महिला उम्र में उससे बड़ी है, तलाकशुदा है और ईसाई धर्म से है, जिसके कारण उसके माता-पिता नहीं मान रहे हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 28 नवंबर 2021 को आरोपी ने उसके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए थे।

दिसंबर 2022 में दर्ज हुई थी FIR और 30 लाख का समझौता

इन आरोपों के आधार पर दिसंबर 2022 में आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 (रेप) और 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद आरोपी को बरी कर दिया था। इसी फैसले को महिला ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

हाई कोर्ट की टिप्पणी और भाई की गवाही

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान 1 बहुत बड़ा खुलासा हुआ। कोर्ट ने पाया कि महिला 30 लाख रुपए लेकर इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए तैयार हो गई थी। समझौते के तहत आरोपी ने उसे 15 लाख रुपए का एक चेक भी दिया था, लेकिन बाद में समझौता न हो पाने के कारण उस चेक को बीच में ही रोक दिया गया।

इसके अलावा, कोर्ट ने महिला के भाई के बयान पर भी विशेष गौर किया। भाई ने अपनी गवाही में बताया था कि अलग धर्म होने के बावजूद दोनों के बीच संबंध इसलिए बने क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे। इन सभी सबूतों, 30 लाख के समझौते की बात और लिव-इन की लंबी अवधि को देखते हुए हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और आरोपी को बरी करने के आदेश को बरकरार रखा।

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