Russian Oil Tariff Waiver: भारत पर 100% टैरिफ का खतरा फिलहाल टला, अमेरिका ने कहा असर आंकने के लिए चाहिए 60 दिन

नई दिल्ली: Russian Oil Tariff Waiver ने भारतीय कारोबारियों और निर्यातकों को बड़ी राहत दी है। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों के सामान पर अमेरिका 100% अतिरिक्त शुल्क लगाने वाला था, जो 18 अक्टूबर 2026 यानी आज से लागू होना था। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन दंडात्मक शुल्कों पर फिलहाल रोक लगा दी है। अब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत दौरे से पहले साफ किया है कि ट्रंप प्रशासन इन प्रतिबंधों और टैरिफ के आर्थिक असर का आकलन करने के लिए 60 दिन का समय लेना चाहता है।
क्या है ग्राहम कानून और कितना बड़ा था खतरा
अमेरिका में 18 सितंबर 2026 को लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 पारित हुआ था। इस कानून में रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ और रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले बड़े देशों के सामान पर 100% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान है। भारत रूसी तेल के बड़े खरीदारों में है, इसलिए भारतीय निर्यात पर सीधा खतरा मंडरा रहा था।
ट्रंप ने कानून की धारा 115 का इस्तेमाल कर इन शुल्कों को माफ कर दिया है। हालांकि इस छूट की कोई तय अंतिम तारीख नहीं रखी गई है। यानी अमेरिका जब चाहे इसे वापस ले सकता है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि का दफ्तर रूसी ऊर्जा की खरीद पर लगातार नजर रखेगा।
Russian Oil Tariff Waiver पर रुबियो ने क्या कहा
मार्को रुबियो ने भारत को अहम रणनीतिक साझेदार बताया। उन्होंने माना कि भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है, लेकिन सप्लाई में रुकावटों के बीच वह अब भी काफी हद तक रूसी तेल पर निर्भर है। रुबियो के मुताबिक छूट का प्रावधान इसलिए रखा गया था ताकि आर्थिक दंड लागू करने से पहले वाशिंगटन बदलती परिस्थितियों को समझ सके।
रुबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बीच 20 अक्टूबर को मुंबई में द्विपक्षीय बातचीत होगी। विदेश मंत्रालय के मुताबिक इसमें व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा और नई तकनीक पर चर्चा होगी।
अमेरिका के सुर क्यों बदले
कानून पारित होने के कुछ ही हफ्तों में अमेरिका को कदम पीछे खींचने पड़े। इसके पीछे 3 बड़ी वजहें मानी जा रही हैं:
- अमेरिका की अपनी जरूरत: 9 अक्टूबर को रूस से हुए एक समझौते के तहत अमेरिका ईंधन की किल्लत और बढ़ती कीमतें काबू करने के लिए खुद रूसी डीजल खरीदने पर राजी हुआ है।
- चीन से समझौता: पिछले महीने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे में तय हुआ था कि 10 जनवरी 2027 तक चीन पर टैरिफ नहीं बढ़ेंगे।
- भारत से रिश्तों का जोखिम: ऐसे माहौल में केवल भारत पर शुल्क लगाने से दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ता खटाई में पड़ सकती थी।
निर्यातकों और छोटे उद्योगों ने ली राहत की सांस
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन के महानिदेशक और सीईओ डॉ. अजय सहाय ने कहा कि इस फैसले से कपड़ा, चमड़ा, रत्न आभूषण और इंजीनियरिंग सामान जैसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टर को सबसे ज्यादा फायदा होगा। अमेरिकी खरीदार अब बिना डर के भारतीय कंपनियों को ऑर्डर दे सकेंगे। हालांकि उन्होंने निर्यातकों को सतर्क रहने की सलाह भी दी।
इंडिया एसएमई फोरम के अध्यक्ष विनोद कुमार ने कहा कि टैरिफ की अनिश्चितता शुल्क लगने से पहले ही छोटे कारोबार को चोट पहुंचाने लगती है। खरीदार ऑर्डर टाल देते हैं, सौदों की कीमत तय करना मुश्किल हो जाता है और कंपनियों की कार्यशील पूंजी फंस जाती है।
विशेषज्ञ बोले, राहत मिली है, गारंटी नहीं
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि यह छूट अस्थायी राहत है, स्थायी भरोसा नहीं। उन्होंने सरकार को सलाह दी कि इस राहत के बदले अमेरिका को कोई स्थायी व्यापारिक रियायत न दी जाए और भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा का ध्यान रखते हुए कारोबारी शर्तों पर तेल खरीदता रहे।
आंकड़े बताते हैं कि भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी जुलाई के 51% से घटकर अगस्त में 44% रह गई। भारत ने महंगा होने के बावजूद अमेरिका और यूएई से तेल खरीद बढ़ाई है।
आम आदमी और बाजार पर क्या असर
अगर 100% शुल्क लागू हो जाता, तो अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान काफी महंगा हो जाता और ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टर पर सीधा असर पड़ सकता था। फिलहाल यह खतरा टल गया है, लेकिन 60 दिन बाद अमेरिका का रुख क्या होगा, इस पर सबकी नजर रहेगी। वाणिज्य मंत्रालय और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब और अहम हो गया है। घरेलू मोर्चे पर बैंकों की कर्ज दरों में हुई बढ़ोतरी से पहले ही लोगों की जेब पर दबाव है। ऐसे में Russian Oil Tariff Waiver से बाजार को कुछ स्थिरता मिल सकती है। कारोबार की ताजा खबरें यहां पढ़ें।






