Rajiv Gandhi 1991 Election: जब राजीव ने आडवाणी के खिलाफ उतारा ‘सुपरस्टार’; वो आखिरी तस्वीर और वोटिंग के दिन सोनिया की घबराहट

Political History (New Delhi): यह 1991 का दौर था। वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर की गठबंधन सरकारें नाकाम साबित हो चुकी थीं और कांग्रेस को सत्ता में वापसी का शानदार मौका दिख रहा था।[Rajiv Gandhi 1991 Election] लेकिन कांग्रेस की राह में सबसे बड़े रोड़े थे राम जन्मभूमि आंदोलन के नायक लालकृष्ण आडवाणी।
उसी दौरान नई दिल्ली सीट से आडवाणी को घेरने के लिए राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) ने बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना को मैदान में उतारा। यह चुनाव सिर्फ हार-जीत का नहीं था, बल्कि इससे जुड़ी 20 मई 1991 की वह सुबह इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई, क्योंकि इसके कुछ ही घंटों बाद देश ने अपने पूर्व प्रधानमंत्री को खो दिया था।
खबर की मुख्य बातें (Highlights)
- आखिरी तस्वीर: 20 मई 1991 को निर्माण भवन पोलिंग बूथ पर कतार में लगे राजीव गांधी की वह आखिरी सार्वजनिक तस्वीर थी।
- प्रियंका का 1ला वोट: प्रियंका गांधी ने भी उसी दिन अपने जीवन के 19 साल पूरे होने पर 1ली बार मतदान किया था।
- सोनिया की घबराहट: पूजा की थाली गिरने से सोनिया सहम गई थीं, राजीव ने हाथ दबाकर उन्हें ढांढस बंधाया था।
- खन्ना का दांव: आडवाणी को हराने और अमिताभ बच्चन के इस्तीफे का जवाब देने के लिए खन्ना को टिकट मिला था।
वह आखिरी खुशनुमा सुबह और सोनिया की घबराहट
मतदान की तारीख 20 मई 1991 थी। सुबह के करीब 7:30 बजने जा रहे थे। नई दिल्ली के निर्माण भवन पोलिंग बूथ पर राजीव गांधी और सोनिया गांधी मतदाताओं की कतार में खड़े थे। प्रियंका गांधी भी 1ली बार वोट डालने आई थीं (उन्होंने हाल ही में 19 साल पूरे किए थे)।
तभी 1 उत्साहित पार्टी कार्यकर्ता अच्छी शुरुआत के लिए पूजा की थाल लेकर आगे बढ़ा, लेकिन राजीव के करीब पहुंचते ही घबराहट में उसके हाथ से थाली नीचे गिर गई। राजीव के ठीक पीछे खड़ीं सोनिया गांधी यह देखकर सहम गईं। राजीव ने तुरंत पत्नी की बेचैनी को भांप लिया, धीरे से उनका हाथ दबाया और ढांढस बंधाने की कोशिश की।
सोनिया इतने तनाव में थीं कि मतपत्र पर दर्जनों चुनाव चिह्नों के बीच वे कांग्रेस के ‘हाथ’ के निशान को भी बमुश्किल ढूंढ पाईं। बाद में सोनिया ने बताया था: “मुझे 1 क्षण के लिए तो लगा कि मैं राजेश खन्ना के लिए बिना वोट डाले ही वहां से लौट जाऊंगी।”
21 मई के अखबारों में छपी आखिरी तस्वीर
पोलिंग बूथ की लाइन में खड़े राजीव गांधी की यह आखिरी सार्वजनिक तस्वीर थी, जो 21 मई की सुबह दिल्ली के लगभग सभी अखबारों में छपी। दुर्भाग्य से, इसके कुछ ही घंटों बाद तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में 1 आत्मघाती हमले में उनकी हत्या कर दी गई।
1 तीर से 2 शिकार: आडवाणी के खिलाफ राजेश खन्ना क्यों?
राजीव गांधी 1 ऐसे सुपरस्टार की तलाश में थे, जिसके जरिए 1 तीर से 2 शिकार किए जा सकें— 1 जो आडवाणी को हरा सके और दूसरा, जो अमिताभ बच्चन का सटीक जवाब बन सके।
बोफोर्स घोटाले में नाम उछलने के कारण अमिताभ बच्चन ने 1987 (करीब 3 साल बाद) में लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। राजीव इसे ‘विश्वासघात’ मान रहे थे। उन्होंने 1984 वाला दांव फिर चलने की सोची, जब अमिताभ ने दिग्गज हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया था।
सलाहकार आर.के. धवन के जरिए राजेश खन्ना से संपर्क साधा गया। खन्ना तब 49 साल के थे और 1 के बाद 1 फ्लॉप फिल्मों से उनकी छवि उतार पर थी। वे महाराष्ट्र की ठाणे सीट चाहते थे, लेकिन पंजाबी बहुल नई दिल्ली सीट के लिए वे मान गए।
जब खन्ना ने सुनाया ‘छपरी टाइप’ नाम वाला किस्सा
20 मई की उसी सुबह कतार में राजेश खन्ना ठीक राजीव गांधी के पीछे खड़े थे। वे हल्के-फुल्के जोक्स सुना रहे थे। खन्ना ने बताया कि 1975-76 के दौरान वे अपनी फिल्म ‘आशिक हूं बहारों का’ के प्रिंट लेकर 10 जनपथ (तब यूथ कांग्रेस दफ्तर) गए थे। वे फिल्म यूथ कांग्रेस को समर्पित करना चाहते थे, लेकिन संजय गांधी को फिल्म का नाम कुछ ज्यादा ही ‘छपरी टाइप’ लगा था।
नतीजे: आडवाणी की बमुश्किल जीत, फिर खन्ना का कमबैक
इस चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी नई दिल्ली से केवल 1589 मतों से किसी तरह जीत पाए। चूंकि वे गांधीनगर से भी करीब 1.25 लाख वोटों से जीते थे, इसलिए उन्होंने आनन-फानन में नई दिल्ली सीट खाली कर दी। इसके बाद हुए उपचुनाव में राजेश खन्ना ने शत्रुघ्न सिन्हा को हराकर संसद में शानदार एंट्री की थी।






