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Chhattisgarh High Court का अहम फैसला: “केवल वरिष्ठ होने से उच्च पद का प्रभार पाने का अधिकार नहीं”, गरियाबंद DEO मामले में याचिका खारिज

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति और प्रभार को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। गरियाबंद जिले के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के प्रभारी पद से जुड़ी एक सेवा याचिका को पूरी तरह से खारिज करते हुए, अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी कर्मचारी केवल अपनी वरिष्ठता (Seniority) के आधार पर किसी ऊंचे पद का प्रभारी बनने का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की सिंगल बेंच का यह फैसला राज्य के प्रशासनिक और सरकारी हलकों के लिए एक बड़ी नजीर साबित होगा।

वरिष्ठता के साथ-साथ योग्यता और अनुभव भी जरूरी, Chhattisgarh High Court

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सरकारी व्यवस्थाओं को लेकर अहम टिप्पणी की। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने अपने आदेश में स्पष्ट किया:

  • अस्थायी व्यवस्था: किसी भी उच्च पद का प्रभार (Charge) देना पूरी तरह से एक अस्थायी (Temporary) और प्रशासनिक व्यवस्था होती है।
  • सिर्फ सीनियरिटी काफी नहीं: सरकार या संबंधित प्राधिकारी किसी भी अधिकारी को प्रभार सौंपते समय केवल उसकी वरिष्ठता ही नहीं देखता।
  • उपयुक्तता का पैमाना: वरिष्ठता के साथ-साथ अधिकारी की योग्यता (Merit), उसका काम का अनुभव, उस विशिष्ट पद के लिए उसकी उपयुक्तता और तात्कालिक प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखना भी उतना ही आवश्यक है।

क्या था गरियाबंद DEO विवाद का पूरा मामला? Chhattisgarh High Court

यह पूरा कानूनी विवाद तब शुरू हुआ था जब गरियाबंद में एक वरिष्ठ अधिकारी को दरकिनार करते हुए, उनके मुकाबले एक कनिष्ठ (Junior) अधिकारी को प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी (Incharge DEO) की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई थी।

  • इस प्रशासनिक फैसले से नाराज होकर वरिष्ठ अधिकारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कनिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति को चुनौती दी।
  • उनका तर्क था कि वरिष्ठ होने के नाते यह पद उन्हें मिलना चाहिए था।
  • हालांकि, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अदालत के सामने ऐसा कोई भी बाध्यकारी नियम (Binding Rule) या कानून पेश नहीं कर सके, जिसके तहत किसी वरिष्ठ अधिकारी को ही प्रभार देना अनिवार्य हो।

प्रशासनिक फैसलों में दखल नहीं देगा कोर्ट, Chhattisgarh High Court

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी पूरी तरह से साफ कर दिया कि न्यायालय प्रशासनिक कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेगा। कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी प्रशासनिक निर्णय में कोई बड़ी अवैधता (Illegality), स्पष्ट रूप से की गई मनमानी, या फिर कोई दुर्भावना (Malafide Intention) साबित नहीं हो जाती, तब तक न्यायालय अधिकारियों की नियुक्तियों और उनके तुलनात्मक मूल्यांकन के फैसलों में दखल नहीं देगा।

इन सभी मजबूत तर्कों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य शासन द्वारा 10 जून 2026 को जारी किए गए कनिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति वाले प्रशासनिक आदेश को पूरी तरह सही ठहराते हुए याचिका को खारिज (Dismiss) कर दिया है।

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