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Electoral Promises Fiscal Burden: चुनावी वादों से खाली होगा सरकारी खजाना! राज्यों के बजट पर पड़ेगा 1.7 लाख करोड़ का अतिरिक्त बोझ

हाल ही में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने जनता को लुभाने के लिए कई बड़े-बड़े वादे किए हैं। चुनाव में जीत हासिल करने के बाद अब इन वादों को अमलीजामा पहनाने का वक्त आ गया है। लेकिन आर्थिक जानकारों का मानना है कि इन लोकलुभावन वादों को पूरा करने की कीमत राज्यों की अर्थव्यवस्था को चुकानी होगी। एक अनुमान के मुताबिक, इन चुनावी वादों (Electoral Promises) को पूरा करने के लिए राज्य सरकारों पर सालाना 1.7 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।

तमिलनाडु: टीवीके (TVK) के वादों से खजाने पर सबसे ज्यादा असर

तमिलनाडु में सुपरस्टार थलपति विजय की पार्टी टीवीके (TVK) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और उसका सरकार बनाना तय माना जा रहा है। टीवीके ने अपने घोषणापत्र में जनता से कई बड़े वादे किए हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • 60 साल तक की महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये।
  • 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली और साल में 6 मुफ्त एलपीजी गैस सिलेंडर।
  • बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों को हर महीने 3,000 रुपये की पेंशन।
  • ग्रेजुएट बेरोजगार युवाओं को हर महीने 4,000 रुपये का बेरोजगारी भत्ता।
  • गरीब परिवारों को बेटी की शादी पर 8 ग्राम सोना और सिल्क की एक साड़ी।
  • किसानों के लिए कोऑपरेटिव क्रॉप लोन की पूर्ण माफी।

अगर टीवीके सत्ता में आते ही इन सभी वादों को पूरा करती है, तो इससे राज्य के सरकारी खजाने पर सालाना लगभग 87,900 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। यह खर्च तमिलनाडु की जीडीपी का करीब 2.2% होगा, जिससे राज्य का राजकोषीय घाटा प्रभावित हो सकता है।

पश्चिम बंगाल: बीजेपी के वादों की कितनी होगी कीमत?

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने दो-तिहाई बहुमत के साथ शानदार जीत दर्ज की है। पार्टी ने चुनाव से पहले जनता से कई लोकलुभावन वादे किए थे:

  • महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर को 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये करना।
  • किसानों और बेरोजगार युवाओं को 9,000 रुपये की आर्थिक सहायता देना।
  • धान की एमएसपी (MSP) को राष्ट्रीय स्तर से 30% अधिक करना।

इन वादों को पूरा करने पर पश्चिम बंगाल के खजाने पर सालाना 72,600 करोड़ रुपये का बड़ा बोझ पड़ने का अनुमान है। जानकारों के मुताबिक, केवल महिलाओं को दिया जाने वाला कैश ट्रांसफर ही राज्य की जीडीपी का 3.4 फीसदी तक हो सकता है।

केरल और अन्य राज्यों का हाल

केरल में यूडीएफ (UDF) की सत्ता में वापसी हुई है। चुनाव के दौरान उनके द्वारा किए गए वादों को पूरा करने से नई सरकार पर लगभग 8,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।

एक्सपर्ट्स की राय: लोकलुभावन नीतियों से अर्थव्यवस्था को खतरा

एमके ग्लोबल (Emkay Global) की लीड इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा के अनुसार, “राज्य की राजनीति अब पूरी तरह से आक्रामक पॉपुलिस्ट नीतियों (Populist Policies) पर टिक गई है। 2023 के बाद से लगातार चुनाव के कारण राजकोषीय घाटे और जीडीपी रेशियो में करीब 1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। राजस्व खर्च स्थिर बना हुआ है और पूंजीगत व्यय (Capex) ठहरा हुआ है। अब 3% की सीमा राजकोषीय घाटे की निचली सीमा बनती जा रही है।”

आने वाले समय में पंजाब, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में मुफ्त की योजनाओं और चुनावी वादों की यह होड़ भारत के राज्यों की वित्तीय स्थिति को और भी अधिक चुनौतीपूर्ण बना सकती है।

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