Rupee Weakens Due to US-Iran War: रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, जानिए आपकी EMI, डेली खर्च और निवेश पर क्या होगा असर

Rupee Weakens US Iran War Impact:नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले 3 महीनों से जारी युद्ध (US-Iran War) का गहरा असर अब सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ने लगा है। वैश्विक अनिश्चितता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भारतीय रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर (Rupee Weakens) पर पहुंच गया है। रुपये की इस भारी गिरावट का असर केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आपके डेली खर्च, लोन की ईएमआई (EMI), बच्चों की पढ़ाई और हवाई यात्रा तक सब कुछ प्रभावित होने वाला है।
कच्चा तेल, महंगाई और बढ़ेगी आपकी EMI
भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिसका भुगतान डॉलर में करना होता है।
- डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से भारत के लिए तेल आयात महंगा हो गया है। तेल महंगा होने से जब देश में महंगाई बढ़ने लगती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को बीच में दखल देना पड़ता है।
- महंगाई पर काबू पाने के लिए आरबीआई रेपो रेट (Repo Rate) में बढ़ोतरी कर सकता है। रेपो रेट वह दर होती है जिस पर आरबीआई कमर्शियल बैंकों को कर्ज देता है। इसके बढ़ते ही बैंक अपने लोन की ब्याज दरें बढ़ा देते हैं, जिससे आपके फ्लोटिंग रेट वाले होम और कार लोन की EMI महंगी हो जाती है।
हवाई सफर, होटल और ट्रांसपोर्ट का बढ़ेगा खर्च
रुपये की गिरावट का सबसे ज्यादा नुकसान एविएशन (Aviation) और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को हो रहा है।
- विशेषज्ञ अनिंद्य बनर्जी के अनुसार, एविएशन सेक्टर में विमान ईंधन (ATF) की हिस्सेदारी ऑपरेटिंग कॉस्ट में बढ़कर 55-60% हो गई है, जो पहले 30-40% हुआ करती थी।
- इसके अलावा, विमानन कंपनियों को लीज रेंट और मेंटेनेंस का भुगतान भी डॉलर में करना पड़ता है। डॉलर में भुगतान के लिए अब कंपनियों को ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे उनका मुनाफा घट रहा है।
- इसी नुकसान की भरपाई के लिए ये कंपनियां देश के अंदर हवाई टिकटों के दाम और होटलों के रेट बढ़ा देती हैं।
शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों (FII) का पलायन
रुपये के कमजोर होने से उन कंपनियों के शेयर तेजी से गिर रहे हैं जिन्हें विदेशों में डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इसके साथ ही, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) भी भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। ये विदेशी संस्थागत निवेशक दूसरे देशों के बड़े बैंक या म्यूचुअल फंड्स होते हैं। जब वैश्विक स्तर पर युद्ध जैसी अनिश्चितता बढ़ती है, तो ये अपना पैसा शेयर बाजार से निकालकर अमेरिका जैसे सुरक्षित देशों में ले जाते हैं। इसके अलावा, डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से उन माता-पिता का बजट भी बिगड़ जाएगा जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं, क्योंकि अब डॉलर खरीदने के लिए उन्हें ज्यादा रुपये चुकाने होंगे।



