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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, बिना उचित नोटिस के एकतरफा तलाक रद्द

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए फैमिली कोर्ट की ओर से पारित एकतरफा तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ चल रही वैवाहिक कार्यवाही की उचित जानकारी और सुनवाई का अवसर दिए बिना फैसला नहीं सुनाया जा सकता।

मामले में पत्नी को तलाक की कार्यवाही की जानकारी समय पर नहीं मिली थी। इसके बाद फैमिली कोर्ट में उसके खिलाफ एकतरफा आदेश पारित कर दिया गया। हाईकोर्ट ने मामले की प्रक्रिया की जांच करने के बाद इसे उचित सुनवाई के अधिकार के अनुरूप नहीं माना।

पति ने वर्ष 2024 में दायर किया था तलाक का मामला

मामला सूरजपुर निवासी एक महिला से जुड़ा है। उसके पति ने 9 जनवरी 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में मामला दायर किया था।

कार्यवाही के दौरान पत्नी अदालत में उपस्थित नहीं हुई। इसके बाद फैमिली कोर्ट ने 25 अप्रैल 2024 को एकतरफा तलाक की डिक्री पारित कर दी।

बाद में पत्नी को इस तलाक की जानकारी मिली। उसका कहना था कि उसे तलाक की कार्यवाही के बारे में सही तरीके से जानकारी नहीं दी गई थी और न ही उसे अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला।

पत्नी को बाद में मिली तलाक की जानकारी

महिला के अनुसार उसे 18 नवंबर 2024 को औरंगाबाद में चल रहे भरण-पोषण से जुड़े मामले की काउंसलिंग के दौरान तलाक की डिक्री के बारे में पता चला। इसके बाद उसने अदालत से संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति प्राप्त की।

महिला ने 2 दिसंबर 2024 को एकतरफा तलाक की डिक्री को रद्द करने के लिए आवेदन किया।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या फैमिली कोर्ट ने पत्नी को कानूनी प्रक्रिया के अनुसार पर्याप्त नोटिस दिया था।

नोटिस की प्रक्रिया पर हाईकोर्ट ने उठाया सवाल

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त प्रमाण नहीं था जिससे यह माना जा सके कि पत्नी को सामान्य प्रक्रिया के तहत नोटिस दिया गया था या उसके घर पर नोटिस चस्पा किया गया था।

अदालत ने कहा कि किसी पक्ष के अदालत में उपस्थित नहीं होने मात्र से यह मान लेना उचित नहीं है कि वह जानबूझकर नोटिस से बच रहा है।

अखबार में नोटिस प्रकाशित करना सामान्य प्रक्रिया का पहला विकल्प नहीं है। अदालत ने माना कि यह अंतिम उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे पहले सामान्य तरीके से नोटिस देने और जरूरत पड़ने पर संबंधित पते पर नोटिस चस्पा करने की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।

मामले की फिर से होगी सुनवाई

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से देखने का रास्ता साफ कर दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों को 12 अक्टूबर को फैमिली कोर्ट के सामने उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

इस फैसले का सबसे अहम पहलू यह है कि वैवाहिक विवादों में भी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना जरूरी है।

एकतरफा फैसला तभी उचित माना जा सकता है जब अदालत को यह संतोष हो कि संबंधित पक्ष को विधिवत सूचना दी गई थी और इसके बावजूद वह जानबूझकर कार्यवाही में शामिल नहीं हुआ।

फैसले का व्यापक महत्व

तलाक जैसे मामलों में अदालत का फैसला किसी व्यक्ति के वैवाहिक और सामाजिक जीवन पर सीधा प्रभाव डालता है। ऐसे मामलों में नोटिस की प्रक्रिया महज औपचारिकता नहीं है। संबंधित व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि उसके खिलाफ किस प्रकार की कानूनी कार्यवाही चल रही है।

इस मामले में हाईकोर्ट का हस्तक्षेप इसी बुनियादी न्यायिक सिद्धांत पर केंद्रित रहा। अब फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों को सुनकर आगे की प्रक्रिया तय करेगा।

मामले का अंतिम परिणाम अब दोबारा होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगा।

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