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Balod Mining Conflict: सेमहरडीह और रायपुरा में खनन परियोजना का ग्रामीणों ने किया विरोध, पंचायत ने एनओसी देने से किया इनकार

बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में औद्योगिक विकास और स्थानीय अस्तित्व के बीच एक बड़ा टकराव पैदा हो गया है। केंद्र सरकार की नवरत्न कंपनी को सेमहरडीह और रायपुरा क्षेत्र में फास्फोराइट (Phosphorite) और चूना पत्थर (Limestone) के खनन के लिए ‘कंपोजिट लाइसेंस’ मिलने के बाद प्रभावित गांवों में हड़कंप मच गया है। तहसीलदार द्वारा पंचायतों से एनओसी (अनापत्ति प्रमाण-पत्र) मांगे जाने के बाद से ग्रामीणों ने एकजुट होकर इस परियोजना का विरोध शुरू कर दिया है।

विरोध की मुख्य वजहें

ग्रामीणों का कहना है कि उनकी जमीनें ही उनकी आजीविका और पहचान हैं।

  • अस्तित्व का खतरा: सेमहरडीह, रायपुरा और आसपास की 3 अन्य ग्राम पंचायतों को डर है कि यदि खनिज भंडार की पुष्टि हुई, तो उन्हें अपने गांव खाली करने पड़ेंगे।
  • ग्राम सभा की अनदेखी: ग्रामीणों का आरोप है कि इस संवेदनशील प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले स्थानीय आबादी या ग्राम सभा से कोई राय-मशविरा नहीं किया गया। उन्होंने इसे ‘गुप्त खोज’ का नाम दिया है।
  • सरपंचों का दो टूक जवाब: रायपुरा के सरपंच डेविड बारले समेत अन्य जनप्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीनें और गांव नहीं छोड़ेंगे।

क्या है कंपोजिट लाइसेंस का विवाद?

प्रशासन द्वारा जारी यह ‘कंपोजिट लाइसेंस’ एक दोहरा परमिट है।

  1. पहला चरण: कंपनी को संबंधित क्षेत्र में विस्तृत वैज्ञानिक खोज (Geological Mapping) करने की अनुमति मिलती है।
  2. दूसरा चरण: यदि जमीन के नीचे पर्याप्त मात्रा में खनिज मिलता है, तो यह परमिट स्वचालित रूप से ‘खनन पट्टे’ (Mining Lease) में बदल जाता है। इसी कारण ग्रामीणों को डर है कि वर्तमान में चल रही ड्रिलिंग और खोज के बाद उन्हें विस्थापन का सामना करना पड़ेगा।

आर्थिक महत्व बनाम सामाजिक टकराव

सरकार और विशेषज्ञों की दृष्टि से यह प्रोजेक्ट देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है:

  • कृषि और उद्योग: फास्फोराइट उर्वरक बनाने के लिए अनिवार्य है, जबकि चूना पत्थर सीमेंट उद्योग और बुनियादी ढांचे के विकास की रीढ़ है।
  • आर्थिक आत्मनिर्भरता: खनिजों का घरेलू स्तर पर दोहन भारत को औद्योगिक रूप से मजबूत बना सकता है। लेकिन, इन लक्ष्यों के सामने ‘आदिवासी विस्थापन’ और ‘खेती योग्य जमीन का नुकसान’ प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

प्रशासनिक स्थिति

तहसीलदार मार्रीबंगला देवरी, प्रीतम कुमार साहू ने पुष्टि की है कि शासन के आदेशानुसार एनओसी मांगी गई है, लेकिन अभी तक किसी भी ग्राम पंचायत ने अपनी सहमति नहीं दी है। फिलहाल अधिकारी इस पूरे मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि ग्रामीण आर-पार की लड़ाई के मूड में दिखाई दे रहे हैं।

यह टकराव आने वाले दिनों में और गहरा सकता है, क्योंकि एक तरफ केंद्र और राज्य सरकार की औद्योगिक योजनाएं हैं, तो दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का अपनी संस्कृति और जमीन को बचाने का संकल्प।

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