Bastar Conversion Dispute: बस्तर के करंदोला गांव में शव दफनाने को लेकर भारी तनाव

छत्तीसगढ़ का बस्तर इन दिनों एक नई सामाजिक बहस का केंद्र बन गया है। कभी अपनी शांत और मिलनसार आदिवासी संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले इन इलाकों में अब वैचारिक दूरियां साफ नजर आने लगी हैं। दरअसल भानपुरी पंचायत के करंदोला गांव में एक नया मामला सामने आया है। यहां एक ईसाई मत में मतांतरित महिला का शव दफनाने को लेकर भारी विरोध देखने को मिला है। परिणामस्वरूप यह पूरी घटना Bastar Conversion Dispute का एक बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है।
ग्राम परंपरा और Bastar Conversion Dispute का सीधा प्रभाव
ग्रामीणों ने इस घटना का कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि गांव की जमीन पर ईसाई रीति से अंतिम संस्कार नहीं होने दिया जाएगा। इसके अलावा उन्होंने ग्राम सभा की शक्तियों और अपनी सदियों पुरानी पारंपरिक व्यवस्था का पुरजोर हवाला दिया है।
- गांव वालों का स्पष्ट मानना है कि उनकी पारंपरिक व्यवस्था और रीति-रिवाज सबसे ऊपर हैं।
- बिना सामुदायिक सहमति के गांव की सीमा में कोई भी नया कदम नहीं उठाया जा सकता।
- वन विभाग की फेंसिंग वाली जमीन पर तार हटाकर गड्ढा खोदने से यह तनाव और ज्यादा भड़क गया।
प्रशासन का कड़ा दखल और हिंदू संगठनों की प्रमुख मांगें
तनाव बढ़ता देख पुलिस और प्रशासन की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और मोर्चा संभाला। हालांकि अधिकारियों के काफी समझाने के बाद भी ग्रामीण अपनी बात पर अड़े रहे और पीछे हटने को बिल्कुल तैयार नहीं हुए। अंततः स्थिति को शांत करने और विवाद को टालने के लिए प्रशासन को वह शव जगदलपुर स्थित करकापाल कब्रिस्तान भेजना पड़ा।
इस घटना के बाद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों ने पेसा कानून को सख्ती से लागू करने की मांग तेज कर दी है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया है कि बाहरी मिशनरी संगठन स्थानीय संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। इन संगठनों का कहना है कि हर समाज को स्थानीय परंपराओं और ग्राम व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए ताकि भविष्य में तनाव की स्थिति न बने।



