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CG News: 24 घंटे में ही साय सरकार का यू-टर्न! कर्मचारियों की ‘नेतागिरी’ रोकने वाला आदेश लिया वापस

CG Govt Employees Order Withdrawn:छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में पिछले 24 घंटों से मचा घमासान अब एक बड़े यू-टर्न पर जाकर खत्म हुआ है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों की ‘नेतागिरी’ और राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगाने वाले अपने सख्त आदेश को वापस ले लिया है। भारी राजनीतिक विवाद और विपक्ष के तीखे सवालों के बाद सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा और सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी किए गए इस फरमान को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया है।

विवाद के बाद बैकफुट पर आई सरकार

गौरतलब है कि एक दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन विभाग ने सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 और 1966 का हवाला देते हुए एक बेहद सख्त आदेश जारी किया था।

  • इस आदेश में कहा गया था कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बनेगा और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेगा।
  • इसके साथ ही किसी भी शासकीय या अशासकीय संस्था, समिति या संगठन में बिना अनुमति के पद लेने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  • आदेश का उल्लंघन करने पर सस्पेंशन और बर्खास्तगी जैसी कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी। लेकिन अब बढ़ते विवाद को देखते हुए सरकार ने इस आदेश को वापस ले लिया है।

कांग्रेस ने RSS का नाम लेकर उठाए थे सवाल

सरकार के बैकफुट पर आने की सबसे बड़ी वजह मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा उठाया गया एक तीखा सवाल था।

  • आदेश जारी होते ही कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने सरकार पर निशाना साधा था।
  • कांग्रेस ने पूछा था कि क्या राजनीतिक और गैर-राजनीतिक संगठनों पर बैन लगाने का यह नियम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी लागू होगा?
  • विपक्ष ने सवाल दागा कि जो सरकारी कर्मचारी आरएसएस की शाखाओं या उनके सम्मेलनों में जाते हैं, क्या उन पर भी कार्रवाई होगी? कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह फरमान चुन-चुन कर विरोधियों पर कार्रवाई करने के लिए लाया गया था।

सामाजिक संगठनों को लेकर भी था असमंजस

राजनीतिक दलों के अलावा, इस आदेश ने सरकारी कर्मचारियों के बीच भारी असमंजस पैदा कर दिया था।

इसके अलावा कर्मचारियों के अपने संगठन (जैसे अजाक्स, सपाक्स आदि) भी होते हैं, जो उनके हकों के लिए लड़ते हैं। इस आदेश के बाद यह सवाल खड़ा हो गया था कि क्या कर्मचारी अपने ही संगठनों में पद नहीं ले पाएंगे? इन्हीं तमाम उलझनों और सियासी दबाव के कारण सरकार को मजबूरन अपना आदेश वापस लेना पड़ा।

आदेश में यह स्पष्ट नहीं था कि क्या कर्मचारी सामाजिक या जातीय संस्थाओं के कार्यक्रमों में हिस्सा ले सकते हैं या नहीं।

समाज में कई तरह के जातीय संगठन होते हैं जिनसे लोग स्वाभाविक रूप से जुड़े होते हैं।

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