
दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर से भारी उछाल देखने को मिल रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता विफल होने के बाद हालात और भी ज्यादा तनावपूर्ण हो गए हैं। इस वजह से दुनिया के सामने एक भयानक Global Energy Crisis खड़ा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी के बीच अब बाब अल-मंडेब मार्ग पर भी बड़ा संकट गहराता जा रहा है।
Global Energy Crisis: कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि
दरअसल, होर्मुज मार्ग के बंद होने की खबर से ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम 8 प्रतिशत तक उछलकर 103 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गए हैं। वहीं अमेरिकी क्रूड भी 105 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य को भी निशाना बनाया गया, तो कच्चे तेल की कीमतें 140 डॉलर प्रति बैरल तक आसानी से पहुंच सकती हैं। हालांकि, इसका सीधा और सबसे भयानक असर भारत जैसे विकासशील देशों पर पड़ेगा, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं। इससे महंगाई दर में भी तेज उछाल आने की पूरी संभावना है।
बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर हूती विद्रोहियों की धमकी
इसके अलावा, यमन के हूती विद्रोहियों ने भी चेतावनी दी है कि वे लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाले अहम मार्ग बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद कर सकते हैं।
यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक है। अगर इस मार्ग को ब्लॉक किया जाता है, तो ग्लोबल सप्लाई चेन पूरी तरह से चरमरा जाएगी। जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप का लंबा रास्ता चुनना पड़ेगा, जिससे मालभाड़ा और परिवहन का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। इसका सीधा असर रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों और एलपीजी गैस की कीमतों पर देखने को मिलेगा।
भारत के लिए क्यों है यह चिंता का विषय?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में होर्मुज और बाब अल-मंडेब जैसे अहम रास्तों पर रुकावट आना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी झटके से कम नहीं है।
हाल ही की रिपोर्ट्स के मुताबिक, सप्लाई में आ रही कमी के कारण भारत के कई शहरों में एलपीजी गैस की किल्लत की खबरें सामने आई हैं। इसके परिणामस्वरूप, ट्रांसपोर्ट और निर्माण क्षेत्र की लागत भी काफी बढ़ गई है। कुल मिलाकर यह पूरी स्थिति दर्शाती है कि अगर जल्द ही कोई शांति समझौता नहीं हुआ, तो यह संकट दुनिया को एक भयंकर आर्थिक मंदी की तरफ धकेल सकता है।



