Death Penalty in India: मौत की सजा के लिए फांसी ही रहेगा तरीका; SC ने खारिज की ‘लीथल इंजेक्शन’ की मांग वाली जनहित याचिका

भारत में मृत्युदंड (Death Penalty in India) के लिए फांसी की जगह किसी अन्य ‘कम दर्दनाक’ और ‘मानवीय’ तरीके को अपनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने खारिज कर दी है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल देश में फांसी (Hanging) के जरिए ही मृत्युदंड देने की व्यवस्था संवैधानिक रूप से वैध और प्रभावी रहेगी। इसके साथ ही, सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले से जुड़े तीन पुराने फैसलों (जैसे- दीना बनाम भारत संघ) को किसी बड़ी बेंच (Larger Bench) के पास भेजने की मांग को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि इसके लिए कोई ठोस आधार नहीं है।
खबर की मुख्य बातें (Death Penalty in India)
- SC का बड़ा फैसला: फांसी के विकल्प के रूप में लीथल इंजेक्शन की मांग वाली PIL खारिज।
- संवैधानिक रूप से वैध: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फांसी से मृत्युदंड देने की वर्तमान व्यवस्था पूरी तरह वैध है।
- याचिकाकर्ता का तर्क: फांसी को दर्दनाक बताते हुए अनुच्छेद 21 के तहत ‘सम्मानजनक मौत’ की मांग की गई थी।
- भविष्य के लिए रास्ते खुले: SC ने कहा कि भविष्य में ठोस वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर समीक्षा संभव है।
जनहित याचिका (PIL) में क्या दिए गए थे तर्क?
यह जनहित याचिका सीनियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा (Rishi Malhotra) द्वारा दायर की गई थी। इसमें दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की पुरानी धारा 354(5), जिसे अब BNSS की धारा 393(5) कर दिया गया है, की संवैधानिकता को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलीलें: Death Penalty in India
- फांसी के जरिए मौत की सजा देना बेहद दर्दनाक, क्रूर और अमानवीय (Inhuman) है।
- संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life) के तहत किसी भी व्यक्ति को सम्मानजनक मौत का अधिकार भी मिलना चाहिए।
- फांसी के बाद किसी कैदी को पूरी तरह मृत घोषित करने में लगभग 40 मिनट लग जाते हैं।
- इसके विपरीत, गोली मारने (Firing Squad), जहरीला इंजेक्शन (Lethal Injection), इलेक्ट्रॉक्यूशन या गैस चैंबर जैसे अन्य तरीकों से 5 मिनट के भीतर कैदी की मौत हो जाती है।
- याचिका में संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रस्ताव का भी हवाला दिया गया था, जिसमें कहा गया है कि मृत्युदंड को न्यूनतम कष्ट देने वाले तरीके से अंजाम दिया जाना चाहिए।
‘भविष्य के लिए वैज्ञानिक समीक्षा के रास्ते बंद नहीं’
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया है, (Death Penalty in India) लेकिन अदालत ने अपने फैसले में एक अहम टिप्पणी भी की। SC ने स्पष्ट किया, “इस याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में अगर कोई ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या व्यावहारिक साक्ष्य (Scientific Evidence) सामने आते हैं, तो इस विषय की संवैधानिक समीक्षा नहीं की जा सकती।”
अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन और न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञों (Experts) की एक विशेष समिति बनाकर फांसी के विकल्पों और दूसरे तरीकों के प्रभाव की विस्तृत समीक्षा कर सकती है।
केंद्र सरकार का क्या था रुख?
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने (Death Penalty in India) अदालत को बताया था कि केंद्र सरकार मृत्युदंड के तरीकों पर गंभीरता से विचार कर रही है और इसके लिए एक समिति का गठन भी किया गया है।
- हालांकि, जब कैदियों को फांसी या ‘लीथल इंजेक्शन’ (Lethal Injection) में से कोई एक चुनने का विकल्प देने की बात उठी, तो केंद्र ने अपने हलफनामे में इसे ‘व्यवहारिक रूप से संभव नहीं’ बताया था।
- इसके अलावा, अन्य कानूनी विशेषज्ञों ने अमेरिका में लीथल इंजेक्शन से जुड़ी विफलता (Botched Executions) की घटनाओं का हवाला देते हुए अदालत को बताया था कि फांसी ही मृत्युदंड का सबसे सुरक्षित और त्वरित तरीका है।






