Raipur Airport Land Dispute: रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर किसान का दावा, सुप्रीम कोर्ट से मांगा 3500 करोड़ का मुआवजा

Raipur Airport Land Dispute: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की जमीन से जुड़ा एक बड़ा और ऐतिहासिक मामला सामने आया है। रायपुर के स्थानीय किसान अश्विनी बांधे ने एयरपोर्ट परिसर की करीब 34.35 हेक्टेयर भूमि पर अपना पुश्तैनी अधिकार जताते हुए सीधे देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में याचिका दायर की है। इस याचिका में किसान ने अपनी जमीन के बदले 3500 करोड़ रुपये के भारी-भरकम मुआवजे की मांग की है।
किसान अश्विनी बांधे का स्पष्ट कहना है कि जिस स्थान पर आज स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट का वर्तमान टर्मिनल और अन्य विशाल संरचनाएं खड़ी हैं, वह जमीन मूल रूप से उनके पूर्वजों की थी। यह पूरा मामला दशकों पुराना है और इसके तार ब्रिटिश शासन काल से जुड़े हुए हैं।
1942 में ब्रिटिश सरकार ने लीज पर ली थी जमीन, Raipur Airport Land Dispute
इस पूरे विवाद की जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) के समय तक जाती हैं। दस्तावेजों और याचिका में किए गए दावों के अनुसार, वर्ष 1942 में ब्रिटिश सरकार ने युद्धकालीन आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने के लिए ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ (Defense of India Act) के तहत माना एयरफील्ड के निर्माण की योजना बनाई थी।
- समझौते की शर्तें: किसान का दावा है कि उस समय उनके पूर्वजों को केवल 1300 रुपये की वार्षिक लीज राशि पर अपनी जमीन देने के लिए सहमत कराया गया था।
- वापसी का आश्वासन: उस दौर में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा यह आश्वासन दिया गया था कि द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद यह भूमि मूल मालिकों को लौटा दी जाएगी।
- नियमों की अनदेखी: युद्ध समाप्त होने के बाद भी न तो वह जमीन कभी लौटाई गई और न ही तय की गई शर्तों का पालन किया गया। आज उसी जमीन पर रायपुर का अंतरराष्ट्रीय स्तर का एयरपोर्ट संचालित हो रहा है।
न्याय के लिए 35 वर्षों का लंबा संघर्ष और 20 करोड़ का खर्च
Raipur Airport Land Dispute: किसान अश्विनी बांधे के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन वापस पाने या उसका मुआवजा लेने की यह लड़ाई आसान नहीं रही है। उन्होंने बताया कि वे पिछले 35 वर्षों से इस मामले को लेकर विभिन्न सरकारी कार्यालयों, राजस्व विभागों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
दशकों की इस लंबी कानूनी लड़ाई, दस्तावेजों को जुटाने और अदालती प्रक्रियाओं में अब तक उनका लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च हो चुका है। सालों तक ठोस सबूतों के अभाव में मामला अटका रहा, लेकिन हाल ही में एक प्रदर्शनी ने इस केस की दिशा बदल दी।
संस्कृति विभाग की प्रदर्शनी से मिले पुख्ता सुबूत
किसान अश्विनी बांधे को हाल ही में संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित एक प्रदर्शनी के दौरान भूमि अधिग्रहण से जुड़े पुराने और दुर्लभ राजस्व दस्तावेज प्राप्त हुए।
इन ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स में माना एयरफील्ड के निर्माण के लिए बरौदा, रामचंडी और आसपास के अन्य गांवों की भूमि के अधिग्रहण का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। किसान ने इन पुराने दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां (Certified Copies) निकलवाई हैं और अब उन्हें अपने दावे के समर्थन में सीधे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं निगाहें
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका पर होने वाली आगामी सुनवाई इस ऐतिहासिक मामले की दिशा और दशा तय करेगी। अगर सर्वोच्च अदालत किसान अश्विनी बांधे द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों को वैध मानती है और उनके दावों को स्वीकार कर लेती है, तो यह छत्तीसगढ़ राज्य के सबसे चर्चित और बड़े भूमि विवादों में से एक साबित होगा। फिलहाल प्रशासन, विमानन विभाग और आम जनता की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हुई हैं।






