Chhattisgarh HC: जज की भतीजी कोर्ट में बनी वकील, बेंच ने सुनवाई से खुद को किया अलग; चीफ जस्टिस के सर्कुलर पर भी उठाई आपत्ति

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) में एक अनोखा और कानूनी रूप से बेहद अहम मामला सामने आया है। यहां एक मामले की सुनवाई के दौरान जज की ही भतीजी वकील के तौर पर पेश हो गई, जिसके बाद डिविजन बेंच ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग (Recuse) कर लिया। लेकिन यह मामला सिर्फ सुनवाई से हटने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस दौरान जजों की बेंच ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा जारी किए गए एक हालिया सर्कुलर पर भी कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे ‘अदालत के कामकाज में दखल’ बता दिया।
क्या है पूरा मामला और एडवोकेट एक्ट का नियम?
यह पूरी घटना जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिविजन बेंच के सामने हुई। बेंच एक वैवाहिक अपील पर सुनवाई कर रही थी।
- सुनवाई के दौरान, पीठ के पीठासीन जज जस्टिस अग्रवाल की भतीजी इस मामले में जूनियर वकील के तौर पर पेश हुई।
- एडवोकेट एक्ट की धारा 49 के तहत ‘पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानक’ (अध्याय-II का नियम 6) स्पष्ट रूप से यह कहता है कि कोई भी वकील किसी ऐसे कोर्ट या जज के सामने प्रैक्टिस या बहस नहीं कर सकता, जो उसका करीबी रिश्तेदार हो। इस नियम में भतीजी का रिश्ता भी स्पष्ट रूप से शामिल है।
- इसी नियम का हवाला देते हुए बेंच ने टिप्पणी की कि भविष्य में किसी भी ‘अवांछित विवाद’ से बचने के लिए यह उचित है कि इस मामले की सुनवाई कोई दूसरी बेंच करे।
चीफ जस्टिस के सर्कुलर पर जजों की कड़ी आपत्ति
मामले को दूसरी बेंच को सौंपने से पहले, जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस व्यास की पीठ ने 16 अप्रैल 2026 को चीफ जस्टिस के निर्देश पर रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए गए एक सर्कुलर का भी कड़ा संज्ञान लिया।
- दरअसल, यह सर्कुलर अदालतों में ‘बेंच हंटिंग’ (मनचाही बेंच चुनने की प्रथा) को रोकने के लिए जारी किया गया था।
- सर्कुलर में कहा गया था कि किसी जज का सुनवाई से हटना (Recusal) एक ‘सामान्य नियम’ नहीं बल्कि एक दुर्लभ अपवाद होना चाहिए।
- सर्कुलर में यह भी निर्देश दिया गया था कि यदि किसी जज का कोई रिश्तेदार वकील कोई केस ले लेता है, तो जज को केवल इसी आधार पर खुद को सुनवाई से अलग नहीं कर लेना चाहिए। जजों को मामले की जांच करनी चाहिए कि कहीं यह जानबूझकर उस विशेष बेंच से बचने की साजिश तो नहीं है।
सर्कुलर को बताया ‘कामकाज में दखल’
डिविजन बेंच ने इस सर्कुलर पर बेहद सख्त रुख अपनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह तय करना कि किस मामले की सुनवाई से हटना है और कोर्ट को कैसे काम करना है, यह पूरी तरह से संबंधित ‘बेंच का विशेषाधिकार’ है। जजों को इस तरह से निर्देशित या प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।
बेंच ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सर्कुलर सीधे तौर पर ‘कोर्ट के कामकाज में हस्तक्षेप’ (Interference) प्रतीत होता है। अंततः, बेंच ने वैवाहिक अपील के मामले को लिस्टिंग के लिए वापस चीफ जस्टिस के पास भेज दिया ताकि इसे किसी ऐसी उचित बेंच के सामने रखा जा सके जिसमें जस्टिस अग्रवाल शामिल न हों।



