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Narayanpur Village Crisis: आज भी पहाड़ों पर ज़िंदगी! पक्की सड़क नहीं, कंधों पर ढोए जाते हैं मरीज़

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के नारायणपुर ज़िले के कई वनांचल इलाक़ों में बसे गांवों की हालत आज भी आदिम युग जैसी ही बनी हुई है। ताज़ा Narayanpur Village Crisis (नारायणपुर विलेज क्राइसिस) रिपोर्ट के अनुसार, आज़ादी के 70 साल बाद भी यहां के निवासियों को बुनियादी सुविधाओं के लिए सख़्त और लंबा संघर्ष करना पड़ रहा है। जानकारी के मुताबिक़, करमरी ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले लगभग आधा दर्जन गांवों में आज तक कोई पक्की सड़क नहीं बन पाई है, जिससे विकास के सभी सरकारी दावों की साफ़ तौर पर पोल खुलती है।

Narayanpur Village Crisis: विकास (Development) से कोसों दूर हैं ये गांव

नारायणपुर ज़िले के ताडोनार, हिक्कोनार, परलभाट, कुरुषनार और कोडोली जैसे गांव आज भी बाहरी दुनिया से पूरी तरह से कटे हुए हैं। यहां के ग्रामीणों के लिए यात्रा महज़ एक सामान्य शब्द नहीं, बल्कि एक रोज़ाना का सख़्त संघर्ष है। इन गांवों तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है; बल्कि लोगों को ऊबड़-खाबड़ और पथरीले रास्तों से होकर गुज़रना पड़ता है। मॉनसून के मौसम में तो हालात और भी ज़्यादा ख़तरनाक और जानलेवा हो जाते हैं।

कंधों पर मरीज़ (Patient) और 10 किमी पैदल चलकर राशन

इस अकाल और ख़राब हालात का सीधा असर लोगों के रोज़मर्रा के जीवन पर पड़ रहा है। आज भी इन गांवों के निवासी अपने घर का राशन लाने के लिए 8 से 10 किलोमीटर तक पैदल चलते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़मीनी हक़ीक़त तो और भी ज़्यादा डराने वाली है। ख़राब रास्ते के कारण कोई भी एंबुलेंस इन गांवों तक नहीं पहुंच पाती है, जिसके कारण बीमार लोगों को मुख्य सड़क तक कंधों पर उठाकर ले जाना एक भारी मजबूरी बन गया है।

ग्रामीणों को बस एक पक्की सड़क (Paved Road) का इंतज़ार

खराब रास्तों के कारण बच्चों का भविष्य भी भारी संकट में है। स्कूल जाने के लिए रोज़ाना ख़तरनाक रास्तों से गुज़रने की वजह से कई बच्चों को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ती है। इन ग्रामीणों की प्रशासन से बस एक ही सख़्त मांग है – एक पक्की सड़क। उन्हें पूरा विश्वास है कि अगर सड़क बन गई, तो उनके गांव में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के दरवाज़े खुल जाएंगे और उनकी ज़िंदगी पूरी तरह से बदल जाएगी।

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