PM Modi Australia Visit: भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच होने जा रही बड़ी यूरेनियम डील, ड्रैगन की उड़ी नींद; जानें इस दौरे की 5 अहम बातें

International News: जिस यूरेनियम को लेकर अमेरिका और ईरान दशकों से एक-दूसरे के आमने-सामने हैं, उसी यूरेनियम को लेकर भारत अब एक बहुत बड़ा कदम उठाने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi Australia Visit) अपने तीन देशों के दौरे के दूसरे पड़ाव के तहत बुधवार को ऑस्ट्रेलिया पहुंच गए हैं।
यहां पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज के बीच होने वाली शिखर बैठक में कई ऐतिहासिक समझौते होने की उम्मीद है। इनमें सबसे अहम है भारत-ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम डील। इस समझौते के तहत भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ऑस्ट्रेलिया से सीधे यूरेनियम का आयात करेगा। इस डील पर चीन (China) की भी पैनी नजरें गड़ी हुई हैं।
खबर की मुख्य बातें (Highlights)
- बड़ी यूरेनियम डील: भारत अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम का आयात करेगा।
- चीन की घेराबंदी: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक धौंस को चुनौती देने पर जोर।
- 100 गीगावॉट का लक्ष्य: भारत ने 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन को 100 गीगावॉट तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
- डिफेंस और टेक्नोलॉजी: दोनों देशों के बीच ‘डिफेंस इनोवेशन कॉरिडोर’ और ‘क्रिटिकल मिनरल कॉरिडोर’ बनाने पर सहमति संभव है।
भारत को ऑस्ट्रेलिया से ही यूरेनियम क्यों चाहिए?
ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है। विश्व के कुल यूरेनियम भंडार का एक-चौथाई (25%) से ज्यादा हिस्सा अकेले ऑस्ट्रेलिया में मौजूद है।
अब भारत अपनी परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के लिए इस ईंधन की निर्बाध सप्लाई चाहता है। इससे भविष्य में भारत में बनने वाले बड़े डेटा सेंटरों (Data Centers) और AI लैब्स को 24 घंटे ऊर्जा (बिजली) उपलब्ध कराई जा सकेगी। जब ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात होने लगेगा, तो भारत अपने घरेलू यूरेनियम का इस्तेमाल अपनी सामरिक और परमाणु क्षमताओं को मजबूत करने के लिए कर पाएगा।
यूरेनियम बाजार में चीन के एकाधिकार को चुनौती
खनन मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, चीन की सरकारी कंपनियों ने नामीबिया और नाइजर की प्रमुख यूरेनियम खदानों में बड़ी हिस्सेदारी खरीद रखी है। इसके अलावा, चीन कजाखस्तान के यूरेनियम का भी सबसे बड़ा खरीदार है। ऐसे में चीन की इस मोनोपॉली (एकाधिकार) को तोड़ने के लिए भारत, ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम आयात के विकल्प पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में ड्रैगन की उड़ी नींद
पीएम मोदी का यह दौरा हिंद महासागर को खुला और मुक्त रखने के ‘क्वॉड’ (Quad) समूह के मोटो को भी मजबूत करेगा। भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों ही क्वॉड के अहम सदस्य हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब चीन सैन्य विस्तार कर रहा है। हाल ही में जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की भारत यात्रा के दौरान भी चीन पर निर्भरता कम करने वाली सप्लाई चेन बनाने पर जोर दिया गया था। अब ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत ड्रैगन की घेराबंदी मजबूत कर रहा है।
रक्षा और तकनीकी साझेदारी: दोनों देशों के बीच क्या-क्या बड़े समझौते होंगे?
| समझौते का क्षेत्र | मुख्य बिंदु और फायदे |
| डिफेंस इनोवेशन कॉरिडोर | रक्षा क्षेत्र के स्टार्टअप्स और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा। सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ेगा। |
| मैरीटाइम सिक्योरिटी रोडमैप | हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, निगरानी और अवेयरनेस बढ़ाई जाएगी। |
| क्रिटिकल मिनरल कॉरिडोर | सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) के लिए जरूरी खनिजों की सप्लाई चेन मजबूत होगी। |
| PACTS समझौता | साइबर सुरक्षा और अहम तकनीकी सप्लाई चेन को सुरक्षित और मजबूत बनाने पर जोर। |
| सैन्य तैनाती | आतंकवाद विरोधी अभियानों पर जोर। भारतीय सेना के अधिकारियों को ‘ऑस्ट्रेलियन डिफेंस कॉलेज’ में तैनात किया जाएगा। |






