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मिड डे मील में प्रोटीन के लिए सिर्फ अंडे पर क्यो अटकी है सरकार

जनदखल। अगर सिर्फ अंडे से ही प्रोटीन मिल सकता है और बच्चों की सेहत बन सकती है तो मिड डे मील में सरकार को सप्ताह में सिर्फ तीन दिन ही नही बल्कि हफ्ते में सात दिन अंडे परोसना चाहिए। लेकिन जब शाकाहार और मांसाहार के बीच अंडे को लेकर विवाद हो, बच्चो को प्रोटीन युक्त भोजन के विकल्प भी हो और ये लोगो की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हो तो अंडे के बजाय दूसरे ऐसे विकल्प के लिये भी सरकार को तैयार रहना चाहिए। जिसमे प्रोटीन भी मिले और विवाद और विरोध भी न हो।

मध्यान्ह भोजन में बच्चो को प्रोटीन के बहाने अंडे परोसने के सरकारी फैसले का छत्तीसगढ़ में विरोध हो रहा है लेकिन तमाम विरोध के बावजूद सरकार मिड डे मील में अंडे परोसने के फैसले पर पीछे हटने को तैयार नजर नही आती। अंडे के जरिये ही प्रोटीन देने की ऐसी सरकार की क्या मजबूरी है ये समझ से परे है। प्रोटीन के लिए हालांकि सरकार के पास और भी कई विकल्प है जिनको लेकर न विरोध है और न ही विवाद। मध्यान्ह भोजन में बच्चो को सरकार चाहे तो प्रोटीन से भरपूर पनीर भी दे सकती है यही नही बच्चो को  काजू किशमिश और बादाम को खिलाने के बारे में भी सरकार सोच सकती है। लेकिन इन सबके बावजूद सरकार अंडे पर अड़ी है।

फ़ाइल फ़ोटो

मध्यान्ह भोजन में अंडे परोसने के फैसले के विरोध में कवर्धा में कबीरपंथियों के नेतृत्व में एक बड़ा प्रदर्शन भी हो चुका है जिसमे सेकड़ो की तादात में लोग सडक पर उतर आए। लोगो का साफ कहना है अंडे के सेवन से उनकीं धार्मिक भावनाएं आहत होती है। कबीरपंथियों का कहना है कि सरकार को यह तय करना चाहिए कि सरकार की प्राथमिकता मध्यानह भोजन में अंडा परोसना है या की बच्चो को प्रोटीन देना। यदि अंडा देने ही एक मात्र लक्ष्य है तो उसके पीछे का गणित और गुणा भाग सरकार जाने, लेकिन प्रोटीन देना है तो बच्चों को मिड डे मील में प्रोटीन देने के और भी खाद्य आइटम है जिनके बारे में सरकार सोच सकती है।

तत्कालीन बीजेपी सरकार में भी मिड डे मील में बच्चो को अंडा परोसने का प्रस्ताव था लेकिन विरोध के चलते सरकार ने इस फैसले को उचित नही समझ। यही नहीं 2015 में मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने भी विवादों के बाद मिड डे मील में अंडे परोसने का अपना फैसला वापस ले लिया था।

ऐसे शुरू हुआ अंडे का फंडा

सरकारी अफसरों ने 19 जिलो के 66 स्कूलों से मिड डे मील के सैंपल उनकी न्यूट्रिशनल प्रॉपर्टीज चेक करने के लिए कलेक्ट किये जिनमे से ज्यादातर में प्रोटीन के तय मानकों की तुलना में  85 प्रतिशत से ज्यादा थी लेकिन 100 प्रतिशत से कम थी और कहीं कहीं तो 85 प्रतिशत से भी कम थी। बच्चो के भोजन में प्रोटीन की कमी की इसी चिंता ने सरकार को प्रोटीन के लिए अंडे परोसने के फैसले के लिए प्रेरित कर दिया। ऐसे में ये जानना बेहद दिलचस्प होगा कि मिड डे मील में शाकाहार पसंद बच्चो को प्रोटीन युक्त भोजन देने के मकसद से अंडे परोसने का फैसला करने वाली सरकार क्या उन बच्चों को अंडा खाने के लिए राजी कर सकेगी जिन्होंने पारिवारिक संस्कारो के चलते अंडे का स्वाद तक नही चखा और जिनके परिवार को ही अंडे के नाम से एलर्जी है। बहरहाल इन तमाम विवादों के बीच सरकार का मिड डे मील में अंडे पर अड़े रहना कई सवालों को खड़ा कर रहा है।

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